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By Acharya Vijay Shankari:

*———–:मृतात्माओं से संपर्क:————-*
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*भाग–1 व 2*
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्मज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरूदेव व गुरु माँ का कोटि कोटि वन्दन

(पारलौकिक जगत का अस्तित्व है–इसमें सन्देह नहीं। भूत-प्रेत जैसी अशरीरी आत्माओं का अस्तित्व है–इसमें भी सन्देह नहीं। इन सबके सम्बन्ध में जो कुछ देखा है, अनुभव किया है, उन्हींको अपनी भाषा में लिपिबद्ध कर प्रस्तुत कर रहा हूँ—
——परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव श्री।)

परामनोविज्ञान से एम्. ए. करने के बाद मन में आत्माओं के सम्बन्ध में जिज्ञासाओं का उत्पन्न होना स्वाभाविक था। उस समय प्रेतविद्या अथवा आत्म विद्या पर शोध करने की व्यवस्था विश्व विद्यालयों में नहीं थी। अतः मैंने व्यक्तिगत रूप से इस विषय पर खोज करने का निश्चय कर लिया। सबसे पहले मैंने इन दोनों विषयों से सम्बंधित तमाम पुस्तकों तथा हस्त लिखित ग्रन्थों का संग्रह किया। ऐसी पुस्तकों का जो संग्रह मेरे पास है, वैसा शायद ही किसीके पास हो। खोज के सिलसिले में मैंने यह जाना कि आत्माओं के कई भेद हैं, जिनमें जीवात्मा, मृतात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा–ये चार मुख्य हैं।
मृत्यु के बाद मनुष्य कहाँ जाता है और उसकी आत्मा किस अवस्था में रहती है ?–इस विषय में मुझे बचपन से कौतूहल रहा है। सच तो यह है कि मृत्यु के विषय में भय और शोक की भावना से कहीं अधिक जिज्ञासा का भाव मेरे मन में रहा है। शायद इसी कारण मैंने परामनोविज्ञान में एम्. ए. किया और शोध शुरू किया।
वास्तव में मृत्यु जीवन का अन्त नहीं। मृत्यु के बाद भी जीवन है। जैसे दिनभर के श्रम के बाद नींद आवश्यक है, उसी प्रकार जीवनभर के परिश्रम और भाग-दौड़ के बाद मृत्यु आवश्यक है। मृत्यु जीवनभर की थकान के बाद हमें विश्राम और शान्ति प्रदान करती है जिसके फल स्वरुप हम पुनः तरोताजा होकर नया जीवन शुरू करते हैं।
मेरी दृष्टि में मृत्यु का अर्थ है–गहरी नींद जिससे जागने पर हम नया जीवन, नया वातावरण और नया परिवार पाते हैं, फिर हमारी नयी यात्रा शुरू होती है। स्वर्ग-
नर्क केवल कल्पना मात्र है। शास्त्रों में इनकी कल्पना इसलिए की गयी है कि लोग पाप से बचें और सत् कार्य की ओर प्रवृत्त हों। नर्क का भय उन्हें दुष्कार्य से बचाएगा और स्वर्ग सुख की लालसा उन्हें पुण्य कार्य या सत् कार्य की ओर प्रेरित करेगी। जो कुछ भी हैं–वे हमारे विचार हैं, हमारी भावनाएं हैं जिनके ही अनुसार मृत्यु उपरांत हमारे लिए वातावरण तैयार होता है।
मृत्यु एक मंगलकारी क्षण है, एक सुखद और आनंदमय अनुभव है। मगर हम उसे अपने कुसंस्कार, वासना, लोभ-लालच आदि के कारण दारुण और कष्टमय बना लेते हैं। इन्ही सबका संस्कार हमारी आत्मा पर पड़ता रहता है जिससे हम मृत्यु के अज्ञात भय से त्रस्त रहते हैं।
मृत्यु के समय एक नीरव विस्फोट के साथ स्थूल शरीर के परमाणुओं का विघटन शुरू हो जाता है और शरीर को जला देने या ज़मीन में गाड़ देने के बाद भी ये परमाणु वातावरण में बिखरे रहते हैं। लेकिन उनमें फिर से उसी आकृति में एकत्र होने की प्रवृत्ति तीव्र रहती है। साथ ही इनमें मनुष्य की अतृप्त भोग-वासनाओं की लालसा भी बनी रहती है। इसी स्थिति को ‘प्रेतात्मा’ कहते हैं। प्रेतात्मा का शरीर आकाशीय वासनामय होता है। मृत्यु के बाद और प्रेतात्मा के बनने की पूर्व की अल्प अवधि की अवस्था को ‘मृतात्मा’ कहते हैं। मृतात्मा और प्रेतात्मा में बस थोड़ा-सा ही अन्तर है। वासना और कामना अच्छी-बुरी दोनों प्रकार की होती हैं। स्थूल शरीर को छोड़कर जितने भी शरीर हैं, सब भोग शरीर हैं। मृत आत्माओं के भी शरीर भोग शरीर हैं। वे अपनी वासनाओं-कामनाओं की पूर्ति के लिए जीवित व्यक्ति का सहारा लेती हैं। मगर उन्हीं व्यक्तियों का जिनका हृदय दुर्बल और जिनके विचार, भाव, संस्कार आदि उनसे मिलते-जुलते हैं।
मृतात्माओं का शरीर आकाशीय होने के कारण उनकी गति प्रकाश की गति के समान होती है। वे एक क्षण में हज़ारों मील की दूरी तय कर लेती हैं।

भाग–2
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जीवित व्यक्तियों के शरीर में मृतात्माएँ या प्रेतात्माएँ कैसे प्रवेश करती हैं ?

मृतात्माएँ अपने संस्कार और अपनी वासनाओं को जिस व्यक्ति में पाती हैं, उसीके माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर अपनी कामना पूर्ति कर लिया करती हैं। उदहारण के लिए–जैसे किसी व्यक्ति को पढ़ने-लिखने का शौक अधिक है, वह उसका संस्कार बन गया। उसमें पढ़ना-लिखना उसकी वासना कहलायेगी। जब कभी वह अपने संस्कार या अपनी वासना के अनुसार पढ़ने-लिखने बैठेगा, उस समय कोई मृतात्मा जिसकी भी वही वासना रही है, तत्काल उस व्यक्ति की ओर आकर्षित होगी और वासना और संस्कार के ही माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर अपनी वासना की पूर्ति कर लेगी। दूसरी ओर उस व्यक्ति की हालत यह होगी कि वह उस समय का पढ़ा-लिखा भूल जायेगा। किसी भी प्रकार का उसमें अपना संस्कार न बन पायेगा।
इसी प्रकार अन्य वासना, कामना और संस्कार के विषय में भी समझना चाहिए। हमारी जिस वासना को मृतात्माएँ भोगती हैं, उसका परिणाम हमारे लिए कुछ भी नहीं होता। इसके विपरीत, कुछ समय के लिए उस वासना के प्रति हमारे मन में अरुचि पैदा हो जाती है।
प्रेतात्माओं के अपने अलग ढंग हैं। वे जिस व्यक्ति को अपनी वासना-कामना अथवा अपने संस्कार के अनुकूल देखती हैं, तुरन्त सूक्ष्मतम प्राणवायु अर्थात्-ईथर के माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और अपनी वासना को संतुष्ट करने लग जाती हैं। इसीको ‘प्रेतबाधा’ कहते हैं। ऐसे व्यक्ति की बाह्य चेतना को प्रेतात्माएँ लुप्त कर उसकी अंतर्चेतना को प्रभावित कर अपनी इच्छानुसार उस व्यक्ति से काम करवाती हैं। इनके कार्य, विचार, भाव उसी व्यक्ति जैसे होते हैं जिस पर वह आरूढ़ होती है।
कहने की आवश्यकता नहीं, इस विषय में पाश्चात्य देशों में अनेक अनुसन्धान हो रहे हैं। परामनोविज्ञान के हज़ारों केंद्र खुल चुके हैं। वास्तव में यह एक अत्यन्त जटिल और गहन विषय है जिसकी विवेचना थोड़े से शब्दों में नहीं की जा सकती।
अच्छे संस्कार और अच्छी वासनाओं और कामनाओं वाली मृतात्माएँ और प्रेतात्माएँ तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर रहती हैं मगर जो कुत्सित भावनाओं, वासनाओं तथा बुरे संस्कार की होती हैं, वे गुरुत्वाकर्षण के भीतर मानवीय वातावरण में ही चक्कर लगाया करती हैं।
इन दोनों प्रकार की आत्माओं को कब और किस अवसर पर मानवीय शरीर मिलेगा और वे कब संसार में लौटेंगी ?–इस विषय में कुछ भी नहीं बतलाया जा सकता।
मगर यह बात सच है कि संसार के प्रति आकर्षण और मनुष्य से संपर्क स्थापित करने की लालसा बराबर उनमें बनी रहती है। वे बराबर ऐसे लोगों की खोज में रहती हैं जिनसे उनकी वासना या उनके संस्कार मिलते-जुलते हों। जो व्यक्ति जिस अवस्था में जिस प्रकृति या स्वभाव का होता है, उसकी मृतात्मा या प्रेतात्मा भी उसी स्वभाव की होती है।
सभी प्रकार की आत्माओं से संपर्क स्थापित करने, उनकी मति-गति का पता लगाने और उनसे लौकिक सहायता प्राप्त के लिए तंत्रशास्त्र में कुल सोलह प्रकार की क्रियाएँ अथवा साधनाएं हैं। पश्चिम के देशों में इसके लिए ‘प्लेन चिट’ का अविष्कार हुआ है। मगर यह साधन पूर्ण सफल नहीं है। इसमें धोखा है। जिस मृतात्मा को बुलाने के लिए प्रयोग किया जाता है, वह स्वयं न आकर, उसके स्थान पर उनकी नक़ल करती हुई दूसरी आस-पास की भटकने वाली मामूली किस्म की आत्मा आ जाती हैं। मृतात्मा यदि बुरे विचारों, भावों और संस्कारों की हुई तो उनके लिए किसी भी साधन-पद्धति का प्रयोग करते समय मन की एकाग्रता की कम ही आवश्यकता पड़ती है मगर जो ऊँचे संस्कार, भाव-विचार और सद्भावना की आत्माएं हैं, उनको आकर्षित करने के लिए अत्यधिक मन की एकाग्रता और विचारों की स्थिरता की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि एकमात्र ‘मन’ ही ऐसी शक्ति है जिससे आकर्षित होकर सभी प्रकार की आत्माएं स्थूल, लौकिक अथवा पार्थिव जगत में प्रकट हो सकती हैं।
सबसे पहले यौगिक क्रियाओं द्वारा अपने मन को एकाग्र और शक्तिशाली बनाना पड़ता है। जब उसमें भरपूर सफलता मिल जाती है, तो तान्त्रिक पद्धति के आधार पर उनसे संपर्क स्थापित करने की चेष्टा की जाती है। भिन्न-भिन्न आत्माओं से संपर्क स्थापित करने की भिन्न भिन्न तान्त्रिक पद्धतियाँ हैं।

भाग–3
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरूदेव अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्मज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव व गुरु माँ को नमन

विश्वब्रह्मांड में क्रियाशील और सर्व्यापक परमतत्व जिसे हम परमात्मा कहते हैं, उसका एक लघु अंश है–आत्मा। उसके भीतर एक चेतनतत्व है जिसे ‘मन’ कहते हैं। जब वह चेतन तत्व अर्थात्–‘मन’ जड़तत्व (आत्मा) के संपर्क में आता है तब उसमें विकार उत्पन्न हो जाता है। तब हम ‘आत्मा’ को ‘जीवात्मा’ कहने लगते हैं। इस विश्वब्रह्मांड में एक और तत्व क्रियाशील है जिससे ‘गति’ उत्पन्न होती है, वह तत्व है–‘प्राणतत्व’। जीवात्मा भौतिक जगत में प्रवेश करने से पहले ‘प्राणतत्व’ का आवरण धारण कर लेती है। इसी आवरण को ‘प्राण शरीर’ या ‘सूक्ष्मशरीर’ कहते हैं। सूक्ष्मशरीर धारी आत्मा को ही ‘सूक्ष्मात्मा’ कहते हैं। मृत्यु के बाद हर मृतक की आत्मा को अपनी वासना के संसकारों के फल स्वरुप कुछ समय तक वासना शरीर अर्थात् प्रेतयोनि ग्रहण करना पड़ता है और अंत्येष्टि और उससे सम्बंधित सभी श्राद्ध आदि क्रियाओं के विधि पूर्वक संपन्न हो चुकने के बाद उसे प्रेत शरीर से मुक्ति मिल जाती है। प्रेत शरीर से मुक्ति के बाद मृतात्मा सूक्ष्म शरीर धारण कर अंतरिक्ष की गहराइयों में चली जाती है और वहां कुछ समय बिता कर पुनः एक नए जीवन के लिए तैयार हो जाती है। अंतरिक्ष में आत्मा द्वारा बिताया गया कुछ समय उसके लिए विश्राम की अवस्था होती है।
मृतात्माओं से संपर्क स्थापित करने के लिए दो मुख्य तरीके हैं। पहला है किसी एकान्त स्थान या कमरे के शान्त वातावरण में आधी रात के समय तेल का दीपक जलाकर एकाग्र मन से किसी तान्त्रिक मन्त्र का जप करना। दूसरा तरीका है किसी व्यक्ति को माध्यम बना कर उसके शरीर से मृतात्माओं से मंत्रबल से संपर्क स्थापित करना। मैंने( गुरुदेव ने) शुरू में पहला तरीका अपनाया।
12 अगस्त सन् 1948 । उस समय मेरी उम्र करीब 25 वर्ष की रही होगी। अन्य लोगों की तरह मैंने भी एक सपना देखा था–प्रेम का सपना। मैंने भी श्यामली से प्रेम किया था। वह भी मुझे चाहती थी। हम दोनों शीघ्र शादी कर लेना चाहते थे। श्यामली को एक युवक गजानन पहले से ही चाहता था, मगर श्यामली उससे घृणा करती थी। जब गजानन को मेरे प्रेम प्रसंग के बारे में पता चला और यह भी पता चला कि वह मुझसे शादी करना चाहती है तो वह भड़क उठा। उसने श्यामली को कई बार धमकाया। श्यामली पर उसकी धमकी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
कुछ दिन बाद मुझे एक जरुरी काम से कलकत्ता जाना पड़ा। जब लौटकर आया तो पता चला कि श्यामली की हत्या कर दी गयी है। मुझे गहरा आघात लगा। मेरे सारे सपने टूट गए और मेरे सामने एक गहरा अँधेरा छा गया। श्यामली का क़त्ल निश्चय ही गजानन ने किया था–इसमें जरा भी सन्देह नहीं था। लेकिन कोई चश्मदीद गवाह न होने और कोई सुबूत न मिलने के कारण गजानन साफ बच गया। मैं भी क्या कर सकता था ?
एक वर्ष का समय बीत गया। श्यामली की दी हुई पीली पुखराज के नग की अंगूठी मेरी उंगली में पड़ी थी। जब कभी गौर से उसकी ओर देखता तो ऐसा लगता कि श्यामली मुझे छोड़कर कहीं नहीं गयी है। किसी अदृश्य तरीके से उसका सम्बन्ध मुझसे अज्ञात रूप से बराबर बना हुआ है। तभी मेरे मन में उसकी आत्मा से संपर्क स्थापित करने की प्रेरणा जाग्रत हुई। उन दिनों मैं बनारस के ‘नगवा’ मोहल्ले में एक मकान में अकेला रहता था।
जाड़े की पूर्णमासी की रात थी। कमरे को मैंने साफ किया और जब आधी रात हुई तो चमेली के तेल का दीपक जलाया और उसके सामने बैठकर एकाग्र और स्थिर चित्त से मंत्रजप करने लगा। गंगा की तरफ वाली खिड़की खुली हुई थी। रूपहली चांदनी छनकर कमरे में भीतर आ रही थी। रात के करीब दो बजे होंगे। चारों ओर सन्नाटा। किसी के होने का कोई संकेत नहीं। तभी चांदनी के सहारे एक छाया को कमरे में प्रवेश करते देखा। पहले तो वह घने कोहरे जैसी लगी मगर बाद में वह धीरे-धीरे वर्फ जैसी ठोस और पारदर्शी हो गयी। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। तभी वह पारदर्शी छाया सुन्दर, साकार युवती के रूप में बदल गयी। उसने पलट कर पीछे की ओर देखा। मैं भी अब उसे साफ साफ देख रहा था–चमकता हुआ सांवला चेहरा, सम्मोहक आँखें। एक विचित्र सी बेचैनी से मन-प्राण जकड गया। सहसा मेरी दृष्टि पुखराज जड़ी अंगूठी पर चली गयी और वे शब्द गूंजने लगे–जब कभी भी अकेले रहोगे तो यह अंगूठी तुम्हें मेरी याद दिला देगी। तन्हाइयों में यह अंगूठी तुम्हें मेरे प्रेम का वास्ता देती रहेगी।
दीपक की मन्द रौशनी में मैंने देखा–वह युवती स्थिर दृष्टि से मेरी ओर निहार रही थी। एकाएक मैंने पूछा–कौन हो तुम ? उत्तर में एक मधुर अट्टहास मेरे कानों से टकराया। वह अट्टहास श्यामली का नहीं, किसी और युवती का था। वह युवती तभी फुसफुसाते हुए बोली–मैं मालकिन हूँ–इस मकान की मालकिन। मेरा नाम शोभा है।
शोभा !–मेरे मुख से निकल पड़ा और तभी तीन साल पहले एक घटी घटना याद आ गयी। मकान मालिक मेरे मित्र थे। उनकी ही पत्नी का नाम शोभा था। शोभा को मैंने पहले कभी नहीं देखा था। शादी के कुछ दिनों के बाद ही पता चला कि शोभा ने आत्म हत्या कर ली। आत्महत्या का कारण क्या था ?–यह अंततक मालूम न चल सका।
तुमने आत्महत्या क्यों की ?
आत्महत्या !–शोभा की आत्मा ने कहा–मैंने आत्महत्या कहाँ की थी? मेरी तो हत्या की गयी थी।
किसने की थी तुम्हारी हत्या ?
तुम्हारे मित्र और मेरे पति ने।
क्यों ?
उनको मुझपर शक हो गया था।–इतना कहकर वह सिसकने लगी। फिर थोड़ी देर बाद बोली–गजानन को तो आप जानते ही हैं।
हाँ, खूब जानता हूँ।
वह मुंझ से शादी करना चाहता था। मगर मेरे माता-पिता इसके लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने मेरी शादी आपके मित्र से कर दी। गजानन बौखला गया। चारों ओर वह मुझे बदनाम करने लगा। उस पापी ने आपके मित्र को बताया कि तुम्हारी पत्नी के साथ मेरा शारीरिक सम्बन्ध रह चुका है। वह मुझसे प्रेम करती थी। मैंने आपके मित्र को खूब समझाया, लेकिन उनको मेरी किसी बात पर विश्वास नहीं हुआ। गजानन ने मेरी जिंदगी नर्क बना दी थी। मगर अब मैं उसे नहीं छोडूंगी। अब मैं गजानन से बदला लूँगी।
दूसरे ही दिन मुझे पता चला कि गजानन अपने कमरे में मृत पाया गया। कमरे का दरवाजा भीतर से बन्द था। उसे तोड़कर जब लोग भीतर घुसे तो देखा वह विस्तर पर औंधे मुंह पड़ा था। मुंह से काफी खून विस्तर पर फैलकर बिखर गया था। गजानन की मृत्यु सबके लिए रहस्य बनी रही। परिस्थितियों को देखरेख कोई हत्या की कल्पना भी नहीं कर सकता था। अतः पुलिस ने आत्महत्या मानकर केस बंद कर दिया।
मैंने श्यामली की मृतात्मा से संपर्क करना चाहा था मगर हो गया शोभा से। अच्छा ही हुआ, एक रहस्य तो खुल गया। यह भी निष्कर्ष निकला कि मृतात्माएँ किसी न किसी तरह अपना बदला लेकर ही मानती हैं। मगर भौतिक दृष्टि से लोगों को कार्य-कारण सम्बन्ध अंततक समझ में नहीं आता।

आगे है–‘श्यामली की मृतात्मा से संपर्क’।

भाग–4
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श्यामली की आत्मा और दादाजी की आत्मा से संपर्क ********************************
शोभा की आत्मा से संपर्क करने के बाद मैंने कई बार श्यामली की मृतात्मा से संपर्क करना चाहा मगर बराबर असफल रहा। कारण समझ में नहीं आया। श्यामली से संपर्क होने के बजाय आस-पास की भटकती अतृप्त आत्माओं से मेरा संपर्क हो जाता था।
आखिर एक रात इसका रहस्य खुल गया। हमेशा की तरह तेल का दीपक जलाकर आधीरात को मन्त्र जप कर रहा था। सहसा मुझे एक बिजली-सा झटका लगा। उसीके साथ मैंने देखा–सामने एक युवती खड़ी थी। मैं तुरन्त पहचान गया। वह श्यामली थी। वह मेरे करीब आना चाहती थी, पर जब भी इसके लिए प्रयास करती तो मेरे और उसके बीच कोहरा जैसा एक पतला पर्दा सा आ जाता।
श्यामली ने मुझे बतलाया–जब भी मैंने तुमसे संपर्क करने का प्रयास किया बार बार मुझे यहाँ आने के लिए कोई अदृश्य शक्ति रोक देती थी। उसके बाद उसने मुझे जो रहस्यमयी कथा सुनाई, वह निश्चय ही पारलौकिक दृष्टि से मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण थी।
गजानन ने ही उसकी हत्या की थी। काफी देर तक तो श्यामली को अपने मरने का अहसास नहीं हुआ था। जब उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हुई, उस समय तक हरिश्चन्द्र घाट पर उसकी लाश आधी से अधिक जल चुकी थी। वह मेरे पास भी पहुंची और मुझसे बात करने की भी काफी कोशिश की, मगर कर न सकी। उसको सबकुछ सपने जैसा लग रहा था। उसी स्थिति में वह न जाने कितने दिनों तक पृथ्वी के वातावरण में भटकती रही थी। कोई अदृश्य शक्ति बराबर उसे इधर-उधर ढकेलती रहती। तभी उसकी दृष्टि एक औरत पर पड़ी। उसने अनुभव किया कि उसकी वासना, भावना और संस्कार उस औरत से काफी मिलते जुलते हैं। एकाएक उस अदृश्य शक्ति के वशीभूत होकर वह उस औरत के शरीर में प्रवेश कर गयी और उसीके साथ उसकी अंतर्चेतना भी लुप्त हो गयी। जब वह वापस लौटी तो उसने अपने आपको शरीर के बन्धन में पाया। वह औरत श्यामली की माँ थी और श्यामली उसकी लड़की।
अन्त में श्यामली ने बतलाया– इस समय मैं पलंग पर अपनी माँ के पास सोई हुई हूँ। मेरे शरीर में केवल सूक्ष्मतम प्राण स्पन्दन कर रहा है। बाहरी तौर से मैं एक प्रकार से मर चुकी हूँ। अगर तुमने मुझे शीघ्र मुक्त नहीं किया तो हो सकता है कि मेरी आत्मा से मेरे शरीर का संपर्क टूट जाए।
मैंने तुरंत ही श्यामली की आत्मा को बन्धन मुक्त कर दिया।
श्यामली के संपर्क से अपनी खोज की दिशा में मुझे दो नयी बातें मालूम हुईं। पहली यह कि मृतात्मा की अंतर्चेतना यदि किसी कारण से लुप्त है तो उससे किसी भी प्रकार से संपर्क नहीं हो सकता। दूसरी बात यह कि यदि मृतात्मा ने कहीं जन्म ले लिया है तो कुछ समय तक अंतर्चेतना के कारण पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहती है। यदि समय की अवधि बढ़ गयी तो उसी स्मृति के आधार पर बालक या बालिका अपने पूर्व जन्म की बातें बतला देती है। जीवन में अंतर्चेतना का बहुत महत्व है। कोई भी शक्ति जो मृतात्मा से संपर्क स्थापित करने का आधार है, तभी सक्रिय होती है जब अंतर्चेतना जाग्रत रहती है।
इसी संदर्भ में मैं एक दूसरी विचित्र रोमांचक घटना सुनाये दे रहा हूँ। मैंने दूसरी विधि के अनुसार अपने एक मित्र के लडके राघव को माध्यम बनाया और उस पर अपने दादाजी की आत्मा का आवाहन करने का प्रयास किया। उनकी मृत्यु एक साल के अन्दर ही हुई थी। वे साधक पुरुष थे। उनका जीवन सात्विक और त्यागमय था। चार घंटे के अथक प्रयत्न के बाद उनकी आत्मा आई। मैंने वास्तविकता को समझने के लिए तुरंत प्रश्न किया–आपकी मृत्यु कब किस दिन हुई थी ?
आत्मा ने सही सही उत्तर दिया।
आपका अस्तित्व इस समय कहाँ है ?–मैंने पुनः प्रश्न किया।
पृथ्वी से बहुत दूर अंतरिक्ष में । इसीलिए आने में इतना समय लगा है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी हमारे लिए बाधक है। इससे भी अधिक कठिन है मनुष्य से संपर्क स्थापित करना।–दादाजी की आत्मा ने मुझे बतलाया।
मृत्यु के तुरंत बाद क्या आप मानव अस्तित्व से सम्बन्ध भंग कर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल गए थे ?
नहीं, कुछ समय तक मृत्यु के बाद प्राप्त नए जीवन और नए वातावरण को समझने का मैंने प्रयास किया और अपनी चिता के जलने तक यहाँ रहा, फिर गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल गया।
क्या आपको अपने परिवार के सदस्यों का स्मरण होता है ?
क्यों नहीं, मगर उन्हीं सदस्यों के विषय में अधिक सोचता हूँ जिनका मुझसे जीवनकाल में सबसे अधिक आत्मीय सम्बन्ध था।
क्या आप मुझे कोई सन्देश देना चाहते हैं ?
हाँ, भविष्य से सम्बंधित कुछ बातें बतला देता हूँ। तुम्हारी कल्याणकारी प्रवृत्ति उपकार, दया, करुणा की भावना ही तुम्हारे नाश का कारण बनेगी। परिवार में तुम्हारा अपना कोई न होगा। सभी तुम्हारे प्रति स्वार्थी होंगे। तुम्हारी मानसिक और वैचारिक उच्चता को साधरण लोग नहीं समझ सकेंगे। नारी के प्रति सदा तुम्हारे हृदय में स्नेह, प्रेम और अपनत्व की भावना रहेगी। मगर बार बार तुम्हें उससे धोखा मिलेगा। सन् 1970 से 1980 के बीच का समय तुम्हारे लिए मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक संक्रांति का काल होगा। 1970 के प्रारम्भ में तुम्हारे जीवन में आने वाली एक स्त्री इस संक्रांति काल का मुख्य कारण बनेगी। तुम उस स्त्री के जघन्य अपराधों और भयंकर पापों को धोने का काफी प्रयास करोगे और उसके कलुषित जीवन में अध्यात्म का संचार करने का भी प्रयास करोगे मगर इसका परिणाम उल्टा ही होगा। समझ लो एक चोर को साधू नहीं बनाया जा सकता। पर एक साधू को बड़ी सरलता से चोर अवश्य बनाया जा सकता है।
इतना कहकर दादाजी की आत्मा अन्तर्ध्यान हो गयी।

आगे है–‘डाकू मानसिंह की आत्मा से संपर्क’।

भाग–5
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डाकू मानसिंह की आत्मा से संपर्क

दादाजी की आत्मा तो अन्तर्ध्यान हो गयी मगर दूसरे ही क्षण राघव(माध्यम) का पूरा शरीर बुरी तरह कांपने लगा। जैसे मिर्गी का दौरा पड़ गया हो उसे। चेहरा काला पड़ गया और ऑंखें लाल हो उठीं। मैं सोच ही रहा था –दादाजी की आत्मा के जाते ही राघव को क्या हो गया। मैंने तान्त्रिक क्रिया बन्द कर दी। उसका भी कोई कुपरिणाम नहीं हो सकता था। मैं एकटक राघव की ओर देख रहा था।
अचानक ख्याल आया कि सम्भव है–राघव की आत्मा दादाजी की आत्मा की शक्ति से विचलित हो गयी हो और उसीका यह परिणाम हो।
मगर नहीं, मेरा विचार सही नहीं था। एकाएक राघव चीख पड़ा और उसीके साथ अट्टहास करते हुए बोला–जानते नहीं, मैं कौन हूँ ?
राघव के चीखने व अट्टहास करने के ढंग से मैं समझ गया कि उस पर कोई तमोगुणी दुष्ट आत्मा आ गयी है।
मैं डाकू मानसिंह हूँ।
यह सुनकर मैं घबरा गया। हाथ से माला छूटकर गिर गयी। किसी प्रकार अपने को संभाला और फिर शान्त स्वर में पूछा–मैंने तो आपको बुलाया नहीं, फिर आप कैसे आ गए ?
मैं रामनगर की रामलीला देखने प्रतिदिन जाता हूँ, इधर से ही गुजरता हूँ। मुझे यहाँ का वातावरण अच्छा लगा। थोड़ी शान्ति का अनुभव हुआ। इस लडके की आत्मा सोई हुई मिली, इसकी अंतर्चेतना भी लुप्त मिली तो मैंने सोचा और फिर आ गया।
आपकी क्या इच्छा है, क्या चाहिए आपको ?
काफी दिनों से भूखा हूँ, खाना खिला सकते हो ?
क्या खाएंगे आप ?
मुर्गे का गोश्त और शराब…
अभी मानसिंह का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि उसीके साथ झनझना कर सौ रूपये के सिक्के ज़मीन पर मेरे चारों तरफ गिरकर बिखर गए। कहाँ से और किधर से आये रूपये ?–मैं तत्काल समझ न सका। तभी कड़कड़ाती हुई आवाज़ गूंजी–ये रुपये मेरे हैं। आपको मुर्गा और शराब लाने के लिए दिए हैं।
हे भगवान ! कहाँ फंस गया मैं ? तत्काल मैंने अपने एक साथी को रात ग्यारह बजे मुर्गे का गोश्त और शराब की बोतल लाने के लिए भेज दिया। मैं जान गया था कि बिना खाये-पिये मानसिंह की आत्मा पिण्ड नहीं छोड़ने वाली।
मैंने सामने गोश्त की प्लेट और शराब की बोतल राख दी। राघव के माध्यम से डाकू मानसिंह की आत्मा ने दस मिनट के अन्दर प्लेट का सारा गोश्त और शराब की बोतल खाली कर दी।
मैं भौंचक्का सा देख रहा था। फिर मैंने पूछा–अब तो आप जायेंगे न ?
हाँ, अब मैं जाऊंगा, मगर सुनो, तुमने मेरी सहायता की है, इसके बदले तुम मुझसे क्या चाहते हो ?
मैंने मन में सोचा–एक भयंकर डाकू की दुष्ट आत्मा से मुझे भला क्या काम ? फिर मैंने विनम्र स्वर में कहा–बस, आपकी मेहरबानी चाहिए।
मेरी बात सुनकर डाकू मानसिंह की आत्मा एकबारगी खिलखिला कर हंस पड़ी। फिर सहज स्वर में बोली–तुम मुझसे भले ही डर रहो हो, डर से कुछ न मांग रहे हो। मगर मैं तुम्हारी एन मौकों पर बराबर मदद किया करूँगा–यह डाकू मानसिंह का वादा है।
मानसिंह की आत्मा के अन्तिम शब्दों के साथ ही राघव सहज हो उठा। डाकू मानसिंह की आत्मा जा चुकी थी। वह आँखें फाड़कर अँधेरे कमरे में चारों ओर देखने लगा।
राघव ! अब तुमको कैसा लग रहा है ?–मैंने पूछा।
बस, ऐसा लग रहा है कि गहरी नींद से मैं अचानक जाग पड़ा।
आत्माओं से संपर्क करने की सच्ची कहानी तो यहाँ ख़त्म हो गयी। मगर अन्त में दो बातें बतला देना जरुरी समझता हूँ। पहली बात यह कि दादाजी की आत्मा ने जो भविष्यवाणियाँ की थीं, वे सत्य सिद्ध हुईं। दूसरी बात यह कि डाकू मानसिंह की आत्मा ने अदृश्य रूप से कई विषम परिस्थिति में मेरी आर्थिक सहायता की। आज भी उसकी आत्मा रामनगर की रामलीला देखने आती है और यह कि वह डाकू की आत्मा थी तो क्या हुआ। डाकू अपने वायदे के पक्के होते हैं। उसने बार बार अपना वादा समय पर निभाया। बिकट स्थिति में भी वह मेरी आर्थिक सहायता करती रही।

समाप्त |||

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 Written By Acharya Vijay ShankarJi:

*———:मृत्यु से पुनर्जन्म की ओर:———*
***********************  भाग–1, 2 व 3  *******************

परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरूदेव अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्मज्ञानगंगा में पावन अवगाहन! पूज्य गुरुदेव व गुरु मां को कोटि कोटि नमन |

अमावस्या की काली अँधेरी रात। लगभग दो बजे का समय था। चारों ओर गहरी निस्तब्धता छाई हुई थी। कभी-कदा लावारिस कुत्तों के भोंकने की आवाज़ सुनाई दे जाती थी।
कुछ ही समय पहले श्मशान में एक चिता घण्टों धू-धू कर जलने के बाद बुझी थी। मगर राख अभी गरम थी। चिता में जलने वाली लाश की अधजली खोपड़ी को श्मशान के डोम चौधरी ने धकेल कर गंगा के गन्दे पानी में फेंका था। गंगा किनारे खड़े पीपल पर मांसखोर पक्षी सहसा ज़ोर से चीख उठा जिसकी आवाज़ सुनकर भोलागिरि महाशय चोंक पड़े और फिर अँधेरे में ही मेरी ओर इशारा किया। मैं दूसरे ही क्षण समझ गया और लपक कर उसी जगह पहुँच गया जहाँ पानी में डोम चौधरी ने लाश की अधजली खोपड़ी फेंकी थी। टटोलकर मैंने खोपड़ी निकाल ली और ला कर भोलागिरि महाशय को थमा दी।
एकान्त कमरे में लकड़ी की एक चौकी पर लाल रेशमी कपडा बिछाकर उसपर खोपड़ी रख दी गयी। फिर उसके सामने लोहबान, अगरबत्ती और चमेली के तेल का दीपक जलाया गया और खोपड़ी को माला पहनाई गयी। उसके बाद भोलागिरि ने लाल सिन्दूर से खोपड़ी पर एक अटपटा सा मन्त्र लिखा और काफी देर तक उसके सामने ध्यानस्थ बैठे रहे। भोलागिरि महाशय आत्मविद्या के महा पंडित और प्रेतशास्त्र के भारी विद्वान थे। मुझे(गुरुदेव) अपनी खोज और शोधकार्य में उनका सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त था। वे मेरे विशेष आग्रह पर उस रात एक भयंकर तान्त्रिक अनुष्ठान की योजना कर रहे थे। यह अनुष्ठान अपने आप में अत्यन्त रहस्यमय था। वे उस खोपड़ी के माध्यम से उसकी आत्मा का आवाहन कर मृत्यु की बाद की स्थितियों से अवगत होना चाहते थे। मैं उनके संकेत पर कमरे के एक कोने में आसन जमा कर मौन साधे बैठा था और उनकी गतिविधि को आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहा था।
ध्यान भंग होने पर भोलागिरि महाशय ने थैले में रखी शराब की बोतल निकाली और पूरी शराब दंहकते हुए कोयले की आग में उडेेल दी। फिर उसी के साथ ढेर सारा लोहबान आग में डाल दिया। धुएँ का एक गुबार सा उठा और चारों ओर फ़ैल गया। शराब और लोहबान की मिली-जुली गन्ध कमरे में चारों ओर फ़ैल गयी। वातावरण एकबारगी रहस्यमय हो उठा और उसी के साथ किसी की फिस फिस कर बोलने की आवाज़ सुनाई दी।

*भाग–2*

वह घुटी-घुटी सी आवाज़ किसकी थी ?–मैं समझ न पाया। तभी गिरि महाशय का गम्भीर स्वर गूंज उठा–कौन हो तुम ? क्या नाम है तुम्हारा ? तुम्हारी मृत्यु कैसे हुई ?
मुझे समझते देर नहीं हुई–खोपड़ी की आत्मा वहां आ गयी थी। स्याह धुएँ की आकृति जो किसी औरत की शक्ल में थी, मैं स्पष्ट सामने देख रहा था। वह आकृति खोपड़ी के नजदीक खड़ी झूल रही थी। टंगे हुए कपडे की तरह हिल-डुल रही थी।
मैं स्थानीय कॉलेज की एक अध्यापिका हूँ। मेरा नाम सुषमा अग्निहोत्री है। संसार में मेरा कोई नहीं है। जीवन में असफल होकर स्वयं आत्महत्या की थी मैंने। मुझे यहाँ इस तरह क्यों बुलाया गया है ?
कुछ रहस्यमय बातों की जानकारी के लिए तुम्हें बुलाया गया है। आप एक पढ़ी-लिखी महिला हैं और मुझे विश्वास है कि आप मेरे प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभवों के अनुसार सही सही देंगी।
क्या जानना चाहते हैं आप ?
आपने आत्महत्या कैसे की ?
ढेर सारी नींद की गोलियां खाकर।
गोलियां खाकर तुरंत आपके मन में कौन सा विचार आया था ? क्या सोचा था तुरंत आपने ?
आह ! मैंने बहुत भारी भूल की। ऐसा मुझे नहीं करना चाहिए था। अब क्या होगा ? मेरी आत्मा मौत की तमाम भयंकर तकलीफों को कैसे सहन करेगी ? मगर नहीं, ऐसा सोचना मेरा भ्रम था। मौत न भयानक होती है और न कष्टदायिनी ही। मौत के सम्बन्ध में जरुरी ज्ञान न होने के कारण ही वह डरावनी और भयानक लगती है। सुषमा की आत्मा ने आगे कहा– मनुष्य चेतन है। इसलिए उसका एक ही स्थिति में बराबर बने रहना सम्भव नहीं है। प्रकृति के सब रूपों में परिवर्तन बराबर होता रहता है तो जीवनयात्रा में गतिशीलता बराबर क्यों नहीं रहेगी ? यात्राक्रम के इन पड़ावों को ही हम जीवन और मृत्यु कहते हैं। इसमें न कुछ अप्रत्याशित है और न आश्चर्यजनक। फिर मरण से भय किस बात का ? वास्तव में मृत्यु के सम्बन्ध में लोग विचार ही नहीं करते। उसकी संभावनाओं और तैयारी के विषय में उपेक्षा बरतते हैं। फलतः समय आने पर मृत्यु् अविज्ञात रहस्य के रूप में सामने आती है जो भयानक और कष्टदायक होती है। अज्ञात की ओर बढ़ने और विचार करने पर ही महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं। इतिहास उन व्यक्तियों और महापुरुषों से भरा पड़ा है जिन्होंने जनप्रवाह के विपरीत अज्ञात दिशा में बढ़ने का साहसभरा पुरुषार्थ दिखाया है।
मृत्योपरान्त जीवन के अस्तित्व को अपनी योगसाधनाओं के माध्यम से देखकर आत्मा के अजर-अमर होने की घोषणा की गयी है। इस तथ्य की पुष्टि अब परामनोविज्ञान नवीन शोधों के द्वारा कर रहा है।
सुषमा अग्निहोत्री की आत्मा ने आगे बतलाया–मरने के पहले जो भय था, वह मरने के बाद समाप्त हो गया। शरीर छूटने की अनुभूति मुझे स्पष्ट रूप से हुई। मरणकाल की घडी न कष्टदायक है और न कौतूहल पूर्ण। इसे असह्य कहने जैसी कोई बात नहीं है जैसा कि कुछ पुस्तकों में बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया है। सब कुछ उतनी ही सरलता से उपलब्ध हो जाता है जितना कि रात्रि में सोते समय वस्त्रों(खासकर गीले) का उतारना।
शरीर से अलग होने के बाद मुझे काफी हल्कापन अनुभव हुआ। काफी देरतक मैं लाल और नीले रंग के गोले में घिरी रही। मेरे शरीर में खास कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। वह शरीर वैसा ही था जैसा कभी मेरा पार्थिव शरीर था। मैं उस नए शरीर में इच्छाओं, कामनाओं, विचारों को तीव्रता से अनुभव कर रही थी और अभी भी कर रही हूँ। मुझे शरीर और संसार से अलग हुए 16 घंटे ही हुए हैं और इन 16 घण्टों में शान्ति का जो अनुभव हुआ है–वह विचित्र है, बतला नहीं सकती। अब मुझे जाने दीजिये।
(सुषमा अग्निहोत्री की आत्मा को मृत्यु के बाद जो अनुभव हुए, वे उनके व्यक्तिगत अनुभव थे या हैं। यह आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति के अनुभव सुषमा जैसे ही हों। हर व्यक्ति अलग है, उसके विचार अलग हैं, संस्कार और कर्म अलग हैं। हो सकता है कि व्यक्ति व्यक्ति के मरणोत्तर अनुभव अलग अलग होते हों।)
मरणोत्तर जीवन के और पुनर्जन्म के भारतीय सिद्धांतों पर विश्वास कर पश्चिम के परामनोवैज्ञानिक उनका विश्लेषण करने के लिए प्रयत्नशील हैं। पुनर्जन्म का बुनियादी आधार है–गीता। इसके अनुसार जीव अपने कर्म और संस्कारों के अनुसार नवीन देह धारण करता है।

*भाग–3*

यद्यपि मुसलमान पुनर्जन्म के बारे में कोई विश्वास नहीं करते, फिरभी उनमें जो सूफ़ी संप्रदाय है, वे लोग पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। सन्त मौलाना जलालुद्दीन ने कहा था–मैं हज़ारों बार इस धरती पर जन्म ले चुका हूँ। इसी तरह ईसाई धर्म भी पुनर्जन्म नहीं मानता, परन्तु पश्चिमी देशों के कई विख्यात दार्शनिकों ने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को स्वीकार किया है।
एडविन आर्नोल्ड ने आत्मा के अमरत्व पर अपने विचार कुछ इस तरह व्यक्त किये थे–आत्मा अजन्मा और अमर है। कोई ऐसा समय नहीं था जब यह नहीं थी। इसका अन्त और आरम्भ स्वप्नमात्र है। मृत्यु ने इसे कभी स्पर्श नहीं किया। यदि हम आत्मा की अमरता पर विश्वास कर लेते हैं तो पुनर्जन्म के बारे में अनास्था का प्रश्न ही नहीं उठता।
मृत्यु के बाद वास्तव में क्या होता है ?–इस विषय पर भी वैज्ञानिक लोग जीव विज्ञान की प्रयोगशालाओं में वर्षों से प्रयोग कर रहे हैं। अमेरिका के ‘विलसा क्लाउड चेम्बर’ के शोध से बड़े आश्चर्यजनक तथ्य सामने आये हैं जिससे वैज्ञानकों को यह बात स्वीकार करनी पड़ी कि मरने के बाद भी किसी न किसी रूप में जीव का अस्तित्व बना रहता है।

विशेष—ऑटोरियो कनाडा के मानव सम्पदा के निर्देशक ‘हर्वग्रिफिन’ दिल के मरीज थे। सन् 1974 में उन्हें तीन दौरे पड़े और फिर 20 बार से अधिक दौरे पड़े। हर बार डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित किये जाने पर कुछ ही मिनटों बाद वे पुनः जीवित हो उठते थे। डॉक्टरों ने उनकी घटना को ‘अनहोनी घटना’ के रूप में स्वीकार किया। मृत्यु के बाद उन्हें जो अनुभूति हो रही थी, वह लगभग एक-सी थी। ग्रिफिन का कहना है कि प्रत्येक मृत्यु के बाद उन्होंने अपने को ‘उज्जवल तेज प्रकाश’ से घिरा हुआ पाया, जिसमें गर्मी की अनुभूति होती थी। मुझे याद् है कि वह बिजली के कड़कने से निकलने वाले प्रकाश जैसा था। ध्यान से देखने पर पाया कि यह मेरी ओर बढ़ रहा है। मेरे और प्रकाश के बीच एक काली सी छाया थी जो उस तेज प्रकाश से मेरी रक्षा कर रही थी। उस समय हमने स्वयं को एक मुड़े हए शरीर के रूप में अनुभव किया। इसके साथ ही काली छाया के तैरने की अनुभूति हो रही थी। इतने में पुनः वह उज्जवल प्रकाश मेरी ओर बढ़ा। डर तो नहीं लगा पर रहस्यात्मक अनुभूति से मैं रोमांचित हो उठा। सोच रहा था कि कहीं वह प्रकाश मुझे पूरी तरह से घेर न ले। ठीक उसी समय हमारा एक पुराना परिचित वहां प्रकट हुआ जिसे मैं छू सकता था। उसने निडर भाव से कहा–जाओ, सब ठीक है। अचानक मुझे सीने पर तेज आघात महसूस हुआ, आवाज़ भी सुनाई दी–क्या बिजली के झटके दिए जाएँ। दूसरी ओर से आवाज आई–नहीं, अभी नहीं, इसकी पलकें झपक रहीं हैं। इसकी आयु अभी पूरी नहीं हुई है। इसे जिन्दा रहना चाहिए। इसके बाद मैं अस्पताल में पड़े अपने शरीर में मैं वापस आ गया।

ग्रिफिन की अनुभूति अस्पष्ट होते हुए भी मरणोत्तर जीवन का ही नहीं, एक ऐसे लोक के अस्तित्व का प्रतिपादन करती है जहाँ स्थूल शरीर की मर्यादाएं समाप्त हो जाती हैं। मृत्यु को जीवन का अन्तिम अतिथि मानकर उसके स्वागत की पूरी तैयारी की जाती रहे। उसके साथ सुखद प्रयासों के लिए आवश्यक साधन जुटाने में तत्परता बरती जाय तो मृत्यु वैसी ही आनंददायक होगी जैसे सुन्दर सुरम्य स्थानों में पर्यटन करना आनंददायक होता है।

भाग–4, 5, 6
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ग्रिफिन के इस प्रयोग के अंतर्गत एक ऐसा सिलेंडर लिया जाता है जिसकी भीतर की परतें विशेष चमकदार होती हैं। फिर उसमें कुछ रसायिनिक घोल डाले जाते हैं जिसके फलस्वरूप भीतर एक विशेष प्रकार की चमकदार गैस फ़ैल जाती है। इस गैस की यह विशेषता है कि यदि कोई परमाणु या इलेक्ट्रॉन इसके भीतर प्रवेश करे तो शक्तिशाली केमरे द्वारा उसका चित्र उतार लिया जाता है।
प्रयोग के लिए उसमें एक चूहा रखा गया। फिर बिजली का करेंट लगाकर उसे मार डाला गया। चूहे के मरने के बाद उस सिलेंडर का चित्र उतारा गया। वैज्ञानिक लोग यह देखकर आश्चर्यचकित हुए कि मृत्यु के बाद गैस के कुहरे में भी मृत चूहे की धुंधली आकृति तैर रही थी। वह आकृति वैसी ही हरकतें कर रही थी जैसी जीवित अवस्था चूहा करता था। इस प्रयोग से यह सिद्ध हो गया कि मृत्यु के बाद भी प्राणी की सत्ता किसी न किसी रूप में अवश्य विद्यमान रहती है। विख्यात तत्वदर्शी, चिन्तक और मनोवैज्ञानिक कार्ल-युंग का एक रहस्यमय विचित्र अनुभव सुनिए–
सन् 1944 में मुझे दिल का दौरा पड़ गया था। डॉक्टरों के अनुसार मैं मृत्यु के मुख में था। जब मुझे ऑक्सीजन और इंजेक्शन दिये जा रहे थे तब मुझे अनेक विचित्र अनुभव हुए। कह नहीं सकता कि मैं अचेतावस्था में था कि स्वप्नावस्था में। पर मुझे स्पष्ट अनुभूति हो रही थी कि मैं अंतरिक्ष में लटका हुआ हूँ और अपने से करीब एक हज़ार मील नीचे स्थित येरूशलम नगर को साफ़ देख रहा हूँ।
फिर मुझे लगा कि मेरा सूक्ष्म शरीर एक पूजा घर में प्रवेश कर रहा है। पूजा का कक्ष प्रकाशमय था। मुझे लग रहा था कि मैं असीम इतिहास का एक खण्ड हूँ और अंतरिक्ष में कहीें विचरण करने की क्षमता रखता हूँ। तभी मुझे अपने ऊपर एक छाया मंडराती हुई दिखाई दी। वास्तव में वह छाया मेरे डॉक्टर की थी। मुझे लगा कि डॉक्टर मुझसे कह रहा है कि तुमको शीघ्र अपने भौतिक शरीर में लौट आना है और जैसे ही मैंने इसका पालन किया, कि मुझे लगा–अब मैं स्वतंत्र नहीं हूँ और मेरा बन्दी जीवन फिर से प्रारम्भ हो गया है। इस अलौकिक अनुभव के कारण जो अन्तर्दृष्टि मुझे प्राप्त हुई, उसने मेरे सारे संशयों का अन्त कर दिया और मैंने जान लिया कि जीवन की समाप्ति पर क्या होता है ? निश्चय ही हमारे जगत में एक चौथा आयाम है जो अनोखे रहस्यों से भरा है।

भाग–5
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मृत्यु के बाद की स्थिति और पुनर्जन्म के पूर्व की स्थिति–कह सकते हैं–एक दूसरे की पूरक होती हैं। मृत्यु के बाद पुनर्जन्म निश्चित है और जन्म के बाद उसकी मृत्यु भी निश्चित है।
जो बच्चे अपनी पूर्व जन्म की बातें बतलाते हैं, उनके विषय में खोज करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि पूर्वजन्म की स्मृति का कारण है व्यक्ति या बालक की इन्द्रियातीत शक्ति। जिस व्यक्ति या बालक में मस्तिष्क शक्ति की अति प्रबलता होती है, उसे अपने पूर्व जन्म का भान हो उठता है।
मृत्यु के बाद से लेकर पुनर्जन्म तक की जीवात्मा की यात्रा निस्संदेह रहस्यमयी होती है। यात्रा के बीच की स्थितियां और अवस्थाएं निश्चय ही रहस्यपूर्ण और तिमिराच्छन्न हैं। वैज्ञानकों और परामनोवैज्ञानिकों के पास इनका कोई समाधान नहीं है और न तो है इन प्रश्नों का उत्तर ही कि मृत्यु के बाद आत्मा कहाँ जाती है ? क्या शरीर के अन्त के साथ जीवन का भी अन्त हो जाता है या शरीर नष्ट हो जाने के पश्चात् आत्मा नयी देह धारण करती है ?–ये और ऐसे ही अनेक प्रश्न हैं जो आदि काल से मानव मस्तिष्क में बराबर उपजते रहे हैं और जिनका केवल आध्यात्मिक स्तर पर उत्तर मिल सका है लेकिन वैज्ञानिक स्तर पर उत्तर आजतक नहीं मिल सका है। विज्ञान यहाँ पर बिलकुल मूक है अभीतक।
सुषमा अग्निहोत्री की मृतात्मा ने मृत्यु के बाद की परिस्थितियों का जो वर्णन किया, उससे एक बात की आशा हो गयी कि तंत्र के मार्ग पर चलकर ही आश्चर्य और कौतूहल से भरे उन परिस्थितियों का पता चल सकता है जो मृत्यु के बाद और पुनर्जन्म के पूर्व की यात्रा के बीच जीवात्मा के सामने उत्पन्न हुआ करती हैं।
सावन-भादों का महीना था। गंगा खूब हिलोरें मार रही थी, दहाड़ रही थी। जब श्मशान पहुंचा तो देखा कि वहां कई लाशें जलने के इंतज़ार में पड़ी हुई थीं। दर्जनों चिताएं जल भी रही थीं। उन चिताओं और लाशों के बीच एक ऊँचे तख़्त पर गद्दी लगाये चौधरी पन्नालाल शराब पी रहे थे और नौकरों को गालियाँ बक रहे थे मगर मुझे देखते ही शराब की बोतल एक ओर रख दी और बोले–पा लागी महाराज ! आवा, कहाँ रहला इतना दिन…?
गद्दी के करीब बैठ गया मैं। तभी जलती हुई लाश की दुर्गन्ध का एक तेज भभका आया और मन-मस्तिष्क पर छा गया एक बारगी। जी मिचला उठा मेरा। जब सब लोग चले गए तो चौधरी ने बतलाया कि उन्होंने एक खोपड़ी की मेरे लिए जुगाड़ कर रखी है और यह भी बतलाया कि खोपड़ी किसी जवान शादीशुदा औरत की है जिसने बंगाल के किसी तान्त्रिक साधू के चक्कर में पड़कर आत्महत्या कर ली थी।
मैंने खोपड़ी लेकर तुरन्त थैले में डाल ली और भोलागिरि महाशय के पास पहुंचा। रात के करीब दस बज रहे थे। गली करीब करीब सुनसान हो गयी थी।थैले से निकालकर खोपड़ी उनके सामने रख दी। एक ही साँस में शराब की पूरी बोतल खाली कर दी उन्होंने और फिर बोले–जा, लेजा, शराब में डुबाकर रख दे इसे। मैं तुरंत दूसरे कमरे में जाकर एक बड़े वर्तन में सारी शराब उढ़ेलकर उसमें खोपड़ी को डुबाकर रख दिया और वापस लौट आया।
दीपावली की रात आई। तान्त्रिक क्रिया शुरू हुई। धीरे धीरे गम्भीर वातावरण रहस्यमय हो उठा। दीपक की पीली लौ एकबार कसमसाई और स्थिर होकर जलने लगी। गिरि महाशय ने महापात्र में मदिरा पान किया और शंख की माला पर कोई मन्त्र जपने लगे। भय और आतंक से मेरा चित्त भर गया।
कोई दस मिनट के बाद फिस्स फिस्स की धीमी आवाज़ सुनाई दी। संभल गया मैं। गिरि महाशय की ओर देखा–उनका चेहरा लाल हो उठा था। एकाएक उनका स्वर गूंज उठा–कौन हो तुम ?
मैं..मैं पश्चिम बंगाल से आई हूँ।
क्या नाम है तुम्हारा ?
ललिता.. ललिता सान्याल।
तुमने आत्महत्या की है ?
हाँ–इतना कहकर ललिता की आत्मा सिसकने लगी।
क्यों आत्महत्या की तुमने ?
आप तंत्रसाधक हैं, स्वयं समझ सकते हैं इसे।
नहीं, तुम बतलाओ मुझे कारण।
ललिता की आत्मा ने सिसकते हुए भरे कण्ठ से जो कुछ बतलाया, उसने मेरी अन्तरात्मा को झकझोर कर रख दिया। उसकी कथा यहाँ देना विषयांतर हो जायेगा। सबकुछ सुन लेने के बाद गिरि महाशय बोले–आत्महत्या करने के बाद तुम्हें कैसा लगा था ?
मैं बहुत दिनों तक यही नहीं जान सकी कि मेरी मृत्यु हो चुकी है और मुझसे दुनियां का कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है। और जब इसका ज्ञान हुआ तो मैंने तत्काल अपने आपको एक नीरव वातावरण में पाया। चारों ओर एक विचित्र सी शान्ति छाई हुई थी। उस अवस्था में मुझे अपने शरीर की याद आई और उसके प्रति मेरा मोह जाग गया। मैंने अपने शरीर को बहुत खोजा लेकिन मुझे नहीं मिला। नदी के जिस स्थान पर मैंने आत्महत्या की थी, वहां एक बहुत विशाल पीपल का पेड़ था। मैं उसी पेड़ पर कुछ दिन रही और फिर वहां से भटकती हुई गंगा किनारे श्मशान में आ पहुंची। वहां पहुँचते ही मुझे दो आदमी खोजते हुए आ पहुंचे। उनका रंग काला था। सिर काफी बड़े और मुड़े हुए थे। उनकी आकृति काफी भयानक थी। दोनों ही मुझे घसीटते हुए ले चलने लगे। दोनों ही नंगे थे। मैं काफी रोई-चिल्लाई-गिड़गिडाई मगर इन सबका उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ा।
वे दोनों मुझे एक ऐसी जगह ले गए जहाँ हज़ारों औरतों और मर्दों की भीड़ थी। पता चला कि वे लोग भी मेरी ही तरह आत्म हत्या कर वहां पहुंचे थे। किसी की जीभ बाहर झूल रही थी तो किसी की आँखें बाहर की ओर निकल रही थीं, किसी की गर्दन ही काफी झूलकर लम्बी हो गयी थी। सभी आत्महत्या के लिए घोर पश्चाताप कर रहे थे। मैंने देखा–संसार में जिस तरह से लोगों ने आत्महत्या की थी, उन लोगों की अलग अलग भीड़ थी। रेल से कटकर मरने वालों की अलग, जहर खाकर मरने वालों की अलग। ऊँचे से कूदकर मरने वालों की अलग, अस्त्र-शस्त्र से मरने वालों की अलग। सभी के सामूहिक पश्चाताप का प्रभाव मुझ पर पड़ा और मैं रोने लगी। उस समय मेरे कष्ट की कोई सीमा नहीं थी।
जब मुझे यह पता चला कि मुझे यहाँ तबतक रहना पड़ेगा, जबतक संसार में बाक़ी मेरी आयु समाप्त नहीं हो जायेगी। एक दिन मुझे ऐसा लगा कि मेरे भौतिक शरीर की खोपड़ी किसी कापालिक के हाथ लग गयी है और वह उसे लेकर काशी गया है। शायद वह कोई साधना करेगा। बात सच निकली। काशी के श्मशान घाट पर धूनी रमाये वह कापालिक मेरी खोपड़ी सामने रखकर कोई मन्त्र जप रहा था, तभी मैं वहां पहुँच गयी और मैंने उस कापालिक को जोर से धक्का दिया। वह एक ओर लुढ़क गया। फिर उठकर चीखता-चिल्लाता भय से कांपता हुआ एक ओर भागा। उसके बाद मैं इस वातावरण में अपने आपको महसूस कर रही हूँ। मुझे यहाँ थोड़ी शान्ति मिल रही है।
तुम्हारी आयु कितनी शेष है ?
अभी पचपन वर्ष, नौ महीने और तीन दिन शेष है।
मृत्यु के समय कितनी आयु थी तुम्हारी ?
सिर्फ चौबीस वर्ष तीन महीना।
क्या तुम इसी तरह शेष आयु में शान्ति अनुभव करना चाहती हो ?
हाँ, मगर कौन देगा मुझे शान्ति, कौन हरेगा मेरा दारुण कष्ट, कौन है मेरी सहायता करने वाला ?
यह सुनकर गिरि महाशय ने उंगली से मेरी ओर इशारा करते हुए कहा–यह व्यक्ति..यह व्यक्ति तुमको शान्ति देगा, तुम्हारे सभी कष्टों को दूर करेगा और तुम्हारी पूरी सहायता करेगा। बोलो, तैयार हो ?
हाँ, मैं तैयार हूँ।

भाग–6
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ठीक है, मैं तैयार हूँ–इतना कहकर ललिता सान्याल की आत्मा वापस चली गयी। उसके जाते ही गिरि महाशय ने उसकी खोपड़ी में मदिरा डाली और उसे मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा–अपनी एक विलक्षण सिद्धि दे रहा हूँ–अलौकिक सिद्धि है यह। सारी मदिरा एक ही सांस में पी डालो।
मैंने खोपड़ी कांपते हाथों से ले ली और एक ही सांस में गट गट कर सारी मदिरा पी गया। सारा शरीर एकबारगी झनझना उठा। कलेजा भी जल उठा उसी के साथ।
जब मैंने शराब पी ली गिरि महाशय आगे बोले– अब और आज से ललिता की आत्मा तुम्हारे साथ रहेगी। उसकी खोपड़ी में इसी तरह मदिरा पीकर तुम उससे कभी भी संपर्क स्थापित कर सकते हो। लेकिन हाँ, इस खोपड़ी का बराबर ख्याल रखना। टूटने न पाये और खोने भी न पाये।
प्रसन्नता से झूम उठा मैं। एक बहुत बड़ी सिद्धि मिल गयी थी मुझे। लेकिन उस समय यह नहीं सोचा कि यही अलौकिक सिध्दि मेरे जीवन में बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर देगी।
उसी समय से ललिता की प्रेतात्मा मेरे साथ रहने लगी, मगर उसके अस्तित्व की अनुभूति मुझे न होती। अनुभूति तभी होती जब मैं उसकी खोपड़ी में भरकर रात के समय मदिरा पान करता। अनुभूति तो होती ही, उसके आलावा उस समय कोमल स्पर्श का भी अनुभव होता। ऐसा लगता–कोई कोमलांगी अपनी कोमल उँगलियों से मेरे अंगों को धीरे धीरे सहला रही है।
गिरि महाशय की मंत्रशक्ति से ललिता की आत्मा की शान्ति एकाएक बढ़ जाती थी और उसका अगोचर सम्बन्ध मदिरा पान करने पर मेरे सूक्ष्म शरीर से स्थापित हो जाता था और उस समय मैं जिस खोपड़ी की आत्मा को उसके माध्यम से बुलाना चाहता था, उसे वह लाकर उपस्थिति कर दिया करती थी।

भाग-7 व 8
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पहली बार मैंने ललिता की आत्मा के माध्यम से जिस खोपड़ी की आत्मा को बुलाया था, वह किसी पढ़े-लिखे कुलीन ब्राह्मण की थी। नाम था–सरजू पाण्डेय। आयु थी चालीस वर्ष के करीब।
सरजू पाण्डेय ने आत्महत्या तो नहीं की थी, मगर उन्हें जहर देकर मार डाला गया था और वह जहर भी दिया गया था उनकी पत्नी कौशल्या के द्वारा। मगर क्यों ? इसलिए कि वह अपने देवर जिसका नाम था राम प्रसाद पाण्डेय–से प्रेम करती थी। वह अपने पति को अपने प्रेम के बीच कांटा नहीं बनने देना चाहती थी। सरजू पाण्डेय काफी पढ़े-लिखे, समझदार व्यक्ति थे। वह इस अवैध सम्बन्ध के बारे में जानते थे, मगर जानबूझकर वह चुप थे। इनसान सबकुछ बर्दाश्त कर सकता है पर अपनी पत्नी की चरित्रहीनता को कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। आखिर एक दिन विस्फोट हो ही गया जिसके फलस्वरूप सरजू पाण्डेय को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
इस प्रसंग में सर्वथा एक नयी रहस्यमयी बात का पता चला–वह यह कि जिस किसी की हत्या का रहस्य रहस्य ही बना रह जाता है और पुलिस उस रहस्य का पता नहीं लगा पाती है या किसी की हत्या को लोग साधारण मृत्यु या आत्महत्या मानकर मौन साध जाते हैं, ऐसी स्थिति में मृतात्मा को बहुत कष्ट होता है। ऐसी मृतात्माएँ कभी-कभी अपनी अदृश्य इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं ऐसा वातावरण या परिस्थितियां उत्पन्न कर देती हैं जिससे हत्या का सारा रहस्य खुल जाता है और अपराधी को दण्ड भी मिल जाता है।
सरजू पाण्डेय की तड़पती आत्मा ने भी ऐसा ही किया था। उसके मामले को आत्महत्या मानकर पुलिस ने अपनी छानबीन बंद कर दी थी। गांव बाले भी चुप हो गए थे। सभी ने समझ लिया कि किसी कारणवश सरजू पाण्डेय ने आत्महत्या कर ली है।
मगर सरजू पाण्डेय की आत्मा चुप नहीं बैठी। वह अपने भाई और अपनी पत्नी के मस्तिष्क पर अपना प्रभाव डालने लगी जिसका परिणाम यह हुआ कि आये दिन उनमें आपस में झगडे होने लगे। एक दिन झगड़ा मारपीट में बदल गया और इसी तरह एक दिन एक दूसरे पर लांछन लगाकर सरजू पाण्डेय की हत्या का रहस्य उगल दिया दोनों ने।
सरजू पाण्डेय की आत्मा ने बतलाया कि दोनों पर केस चल रहा है। मैं जानता हूँ कि क्या होगा अन्त में। राम प्रसाद को फांसी होगी और और कौशल्या को होगा आजीवन कारावास। वैसे अभी मैं स्वतंत्र हूँ मगर शीघ्र ही अपने गांव के मुखिया रमापति की बहू मालती के गर्भ से जन्म लेने वाला हूँ। मैं बराबर मालती के आसपास चक्कर लगाया करता हूँ।
क्यों चक्कर लगाया करते हो ?
सरजू की मृतात्मा ने बतलाता कि मालती के गर्भ में पलने वाले जिस शिशु के रूप में जन्म लेने वाला हूँ, उसके शरीर का निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है। जब शरीर की रचना पूरी हो जाती है, प्राणों का संचार पूर्णतया नस-नाड़ियों में हो जाता है और ह्रदय और मस्तिष्क में भी पूर्णतया रक्तसंचार होने लगता है तभी आत्मा जन्म लेने के दो-तीन घंटे पहले शरीर में प्रवेश करती है और उसीके बाद से माँ के पेट में प्रसवपीड़ा होना आरम्भ हो जाती है और दो-तीन घंटे के भीतर शिशु जन्म ले लेता है।

भाग–8
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क्या तुम मालती के आलावा और किसी के गर्भ में प्रवेश नहीं कर सकते ?–मैंने प्रश्न किया।
इस प्रश्न के उत्तर में सरजू की आत्मा ने जो बतलाया उसका सारांश यह था कि आत्मा को अपनी इच्छानुसार किसी भी गर्भ में प्रवेश करने की स्वतंत्रता नहीं होती। कोई अदृश्य शक्ति बराबर इसके लिए रोकती रहती है। इसी प्रकार दूसरी ओर कर्म और संस्कार के अनुकूल गर्भ में प्रवेश करने के लिए भी प्रेरित करती रहती है। मतलब यह कि आत्मा अपनी इच्छानुसार मनचाहे गर्भ में प्रवेश कर जन्म नहीं ले सकती। इसके लिए वह किसी अदृश्य शक्ति के बन्धन में परतन्त्र रहती है।
जब मैंने सरजू पाण्डेय की आत्मा से यह पूछा कि मृत्यु के क्षण से लेकर गर्भ में प्रवेश करने से पूर्व तक तुम्हें क्या क्या अनुभव हुए और किन् किन् अवस्थाओं और परिस्थितियों से गुजरना पड़ा तो इस पर उसने बतलया —
मुझे रात के समय दूध में जहर दिया गया था। दूध पीने के थोड़ी देर बाद जैसे ही मैं खाट पर लेटा, मुझे चक्कर-सा आने लगा और उसीके साथ पेट और सीने में भी भयंकर दर्द होने लगा। फिर कब और किस क्षण मैं चेतनाशून्य हो गया बतला नहीं सकता और जब चेतना लौटी तो मैंने अपने शरीर को चिता में जलते हुए देखा। वहां गांव वालों और परिवार वालों की भीड़ थी। मैं भी जाकर अपनी चिता के सामने खड़ा हो गया। मुझे अपने शरीर को जलते हुए देखकर काफी दुःख हो रहा था। विवश था, कर ही क्या सकता था ?
जब मेरी चिता जल गयी और सब लोग वापस लौट आये तो श्मशान में मुझे विचित्र रूप रंग के तीन-चार व्यक्ति दिखाई दिए। वे काफी लम्बे थे–कम से कम सात फ़ीट के अवश्य रहे होंगे। उनके शरीर का रंग लाल था। छाती चौड़ी थी। सिर कोहड़े की तरह और मुड़ा हुआ था। सिर पर कम से कम दो फ़ीट की लम्बी चुटिया थी जो कमर तक लटक रही थी। आँखें बड़ी बड़ी और गूलर की तरह लाल थीं। नाक थोड़ी बाहर की ओर निकली हुई थी और नीचे का जबड़ा लटक रहा था।
वे लोग मेरी ओर बढ़ रहे थे। सभी की नज़रें मेरी ओर लगी हुई थीं। जब वे निकट आये और मुझे पकड़ने के लिए लपके तो मैं डरकर वहां से भागा। मगर वे लोग बहुत शक्तिशाली थे। उन लोगों ने मुझे घेरकर पकड़ लिया। रोने लगा मैं। एक ने मुझे डाँटकर कहा–चुप, चल हम लोगों के साथ। वे लोग मुझे पकड़कर एक ऐसे स्थान पर ले गए जहाँ एक ओर तो ऊँचे ऊँचे हरे-भरे वृक्ष थे और दूसरी ओर काफी लम्बा-चौड़ा मैदान था। उस मैदान में सैकड़ों आदमी इकट्ठे थे। शायद उन लोगों को भी मेरी तरह पकड़कर लाया गया था। उन्हें तरह तरह की यातनायें दी जा रही थीं उस समय। लेकिन न कोई चीख-चिल्ला रहा था और न कोई कुछ बोल पा रहा था। सभी मूक होकर यातना सहन कर रहे थे। मुझे भी एक ओर बैठा दिया गया था। मुझे भी यातना मिलेगी–यह सोच कर मैं कांप रहा था। उसी समय मुझे जोर की भूख लगी। मैंने राक्षस जैसे उस व्यक्ति से खाना माँगा। मगर खाना देने के बजाय उसने कस कर मेरी पीठ पर लात जड़ दी और फिर बोला–खाना खायेगा ? कभी किसीको तूने खाना खिलाया भी है जो यहाँ खाना मांग रहा है !
उस लम्बे-चौड़े मकान के एक ओर बड़ा-सा महल था–लाल पत्थरों का बना हुआ। ऊँची ऊँची दीवारें थी। महल में जाने के लिए बड़े बड़े दो फाटक थे। महल में पहले फाटक से लोगों को ले जाया जा रहा था और दूसरे फाटक से उन्हें बाहर कर दिया जाता था। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि भीतर जाने वाला व्यक्ति जब बाहर निकलता था तो उसका रूप-रंग बदला हुआ होता था। कुछ देर बाद मेरी भी बारी आई। मुझे भी पकड़कर भीतर ले जाया गया। पूरे महल में भीतर हल्के गुलाबी रंग का प्रकाश फैला हुआ था। एक काफी लम्बे-चौड़े कमरे में बहुत बड़ा तख़्त बिछा हुआ था जो पुराने ज़माने के राज सिंहासन जैसा था जिसपर लाल रंग की मखमली चादर बिछी हुई थी। उसपर एक काफी मोटा-ताजा भयानक शक्ल-सूरत का व्यक्ति बैठा था जिसे घेरकर भयानक शक्ल के चार-पांच व्यक्ति खड़े थे।
तख़्त पर बैठे हुए उस भयानक व्यक्ति को देखकर मैं पत्ते की तरह कांपने लगा। मेरी घिग्घी बंध गयी। मुझे लाकर उसी व्यक्ति के सामने खड़ा कर दिया गया। जो लोग मुझे वहां ले गए थे, उन्होंने न जाने किस भाषा में मेरे सम्बन्ध में उससे बातें कीं। वह बातें सुन कर बीच बीच में सिर हिलाता जा रहा था। अन्त में उसने कोई आदेश दिया जिसे मैं समझ न सका। मगर जैसे ही मुझे उसके सामने से हटाया गया और दूसरे फाटक से निकाला जाने लगा उसी समय एकाएक मेरे रूप-रंग में परिवर्तन हो गया। अब मैं ब्रह्मराक्षस की शक्ल में था। मुझे शेष आयु ब्रह्मराक्षस की योनि में भोगनी थी।
सरजू पाण्डेय की आत्मा अन्त में बोली–ब्रह्मराक्षस की योनि काफी कष्ट दायिनी होती है। भूख-प्यास लगने पर न तो कुछ खाया जा सकता है और न तो पानी ही पिया जा सकता है। जिस कारण मृत्यु हुई रहती है, उसी दुःख, क्लेश और पीड़ा को यातना के रूप में बराबर भोगना पड़ता है, बराबर अशान्ति की स्थिति बनी रहती है। मैं भी उसी यातना को भोग रहा हूँ और उसी अशान्ति की अवस्था में जी रहा हूँ। उस यातना और अशान्ति से तभी मुक्ति मिलेगी जब जिस समय मेरी आत्मा गर्भ में प्रवेश कर मालती के पुत्र के रूप में आपकी दुनियां में जन्म ले लेगी।
सरजू पाण्डेय की मृतात्मा की मृत्यु से पुनर्जन्म तक की यह अलौकिक कथा यहीं समाप्त हो जाती है। मगर मुझे ललिता की आत्मा के माध्यम से उन आत्माओं से भी साक्षात्कार करना था जिनकी खोपड़ियां मेरे पास सुरक्षित थीं।

समाप्त!!!

आखिर क्यों करते हैं मंत्रोच्चार?
जानिये मंत्र विज्ञान के अध्यात्मिक व वैज्ञानिक फ़ायदे!!!
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शास्त्रकार कहते हैं-
‘मननात् त्रायते इति मंत्र:’
अर्थात मनन करने पर जो त्राण दे या रक्षा करे वही मंत्र है। धर्म, कर्म और मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रेरणा देने वाली शक्ति को मंत्र कहते हैं। तंत्रानुसार देवता के सूक्ष्म शरीर को या इष्टदेव की कृपा को मंत्र कहते हैं।
सही अर्थ में मंत्र जप का उद्देश्य अपने इष्ट को स्मरण करना है।

मंत्र शब्द संस्कृत भाषा से है। संस्कृत के आधार पर मंत्र शब्द का अर्थ सोचना, धारणा करना , समझना व् चाहना होता है। केवल हिन्दुओ में ही नहीं वरन बौध्द, जैन , सिक्ख आदि सभी धर्मों में मंत्र जप किया जाता है। मुस्लिम भाई भी तस्बियां घुमाते है।

हजारों वर्ष पूर्व मंत्र शक्ति के रहस्य को प्राचीनकाल में वैदिक ऋषियों ने ढूंढ निकाला था। उन्होंने उनकी शक्तियों को जानकर ही वेद मंत्रों की रचना की। वैदिक ऋषियों ने ब्रह्मांड की सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट ध्वनियों को सुना और समझा। इसे सुनकर ही उन्होंने मंत्रों की रचना की। उन्होंने जिन मंत्रों का उच्चारण किया, उन मंत्रों को बाद में संस्कृत की लिपि मिली और इस तरह संपूर्ण संस्कृत भाषा ही मंत्र बन गई। संस्कृत की वर्णमाला का निर्माण बहुत ही सूक्ष्म ध्वनियों को सुनकरकिया गया।

मंत्र को सदगुरू के माध्यम से ही ग्रहण करना उचित होता है| सदगुरू ही सही रास्ता दिखा सकते हैं, मंत्र का उच्चारण, जप संख्या, बारीकियां समझा सकते हैं, और साधना काल में विपरीत परिश्तिती आने पर साधक की रक्षा कर सकते हैं|

साधक की प्राथमिक अवशता में सफलता व् साधना की पूर्णता मात्र सदगुरू की शक्ति के माध्यम से ही प्राप्त होती है| यदि साधक द्वारा अनेक बार साधना करने पर भी सफलता प्राप्त न हो, तो सदगुरू विशेष शक्तिपात द्वारा उसे सफलता की मंजिल तक पहुंचा देते हैं|

इस प्रकार मंत्र जप के माध्यम से नर से नारायण बना जा सकता है, जीवन के दुखों को मिटाया जा सकता है तथा अदभुद आनन्द, असीम शान्ति व् पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि मंत्र जप का अर्थ मंत्र कुछ शब्दों को रतना है, अपितु मंत्र जप का अर्थ है – जीवन को पूर्ण बनाना|

मंत्र साधना भी कई प्रकार की होती है। मं‍त्र से किसी देवी या देवता को साधा जाता है और मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी साधा जाता है। ‘मंत्र’ का अर्थ है मन को एक तंत्र में लाना। मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है, तब वह सिद्ध होने लगता है। ‘मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है।

भगवन श्रीकृष्ण जी ने गीता के १० वें अध्याय के २५ वें श्लोक में ‘जपयज्ञ’ को अपनी विभूति बताया है। जपयज्ञ सब के लिए आसान है। इसमें कोई ज्यादा खर्च नही , कोई कठोर नियम नही। यह जब चाहो तब किया जा सकता है।

मंत्र के प्रकार
मंत्र 3 प्रकार के होते हैं : 1. स्त्रीलिंग, 2. पुल्लिंग और 3. नपुंसक लिंग।

1. स्त्रीलिंग : ‘स्वाहा’ से अंत होने वाले मंत्र स्त्रीलिंग हैं।
2. पुल्लिंग : ‘हूं फट्’ वाले पुल्लिंग हैं।
3. नपुंसक : ‘नमः’ अंत वाले नपुंसक हैं।

*मंत्रों के शास्त्रोक्त प्रकार : 1. वैदिक, 2. पौराणिक और 3. साबर।
*कुछ विद्वान इसके प्रकार अलग बताते हैं : 1. वैदिक, 2. तांत्रिक और 3. साबर।

*वैदिक मंत्र के प्रकार : 1. सात्विक और 2. तांत्रिक।
* वैदिक मंत्रों के जप के प्रकार : 1. वैखरी, 2. मध्यमा, 3. पश्यंती और 4. परा।

1. वैखरी : उच्च स्वर से जो जप किया जाता है, उसे वैखरी मंत्र जप कहते हैं।
2. मध्यमा : इसमें होंठ भी नहीं हिलते व दूसरा कोई व्यक्ति मंत्र को सुन भी नहीं सकता।
3. पश्यंती : जिस जप में जिह्वा भी नहीं हिलती, हृदयपूर्वक जप होता है और जप के अर्थ में हमारा चित्त तल्लीन होता जाता है, उसे पश्यंती मंत्र जाप कहते हैं।
4. परा : मंत्र के अर्थ में हमारी वृत्ति स्थिर होने की तैयारी हो, मंत्र जप करते-करते आनंद आने लगे तथा बुद्धि परमात्मा में स्थिर होने लगे, उसे परा मंत्र जप कहते हैं।

जप का प्रभाव : वैखरी से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव मध्यमा में होता है। मध्यमा से 10 गुना प्रभाव पश्यंती में तथा पश्यंती से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव परा में होता है। इस प्रकार परा में स्थित होकर जप करें तो वैखरी का हजार गुना प्रभाव हो जाएगा।

*पौराणिक मंत्र के प्रकार :
पौराणिक मंत्र जप के प्रकार : 1. वाचिक, 2. उपांशु और 3. मानसिक।

1. वाचिक : जिस मंत्र का जप करते समय दूसरा सुन ले, उसको वाचिक जप कहते हैं।
2. उपांशु : जो मंत्र हृदय में जपा जाता है, उसे उपांशु जप कहते हैं।
3. मानसिक : जिसका मौन रहकर जप करें, उसे मानसिक जप कहते हैं।

* वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ध्वनि तरंगें ऊर्जा का ही एक रूप हैं। मंत्र में निहित बीजाक्षरों में उच्चारित ध्वनियों से शक्तिशाली विद्युत तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो चमत्कारी प्रभाव डालती हैं।

* सकारात्मक ध्वनियां शरीर के तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं जबकि नकारात्मक ध्वनियां शरीर की ऊर्जा तक का ह्रास कर देती हैं। मंत्र और कुछ नहीं, बल्कि सकारात्मक ध्वनियों का समूह है, जो विभिन्न शब्दों के संयोग से पैदा होते हैं।

* मंत्रों की ध्वनि से हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों सकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं। स्थूल शरीर जहां स्वस्थ होने लगता हैं, वहीं जब सूक्ष्म शरीर प्रभावित होता है तो हम में या तो सिद्धियों का उद्भव होने लगता है या हमारा संबंध ईथर माध्यम से हो जाता है और इस तरह हमारे मन व मस्तिष्क से निकली इच्छाएं फलित होने लगती हैं।

* निश्चित क्रम में संग्रहीत विशेष वर्ण जिनका विशेष प्रकार से उच्चारण करने पर एक निश्चित अर्थ निकलता है। अंत: मंत्रों के उच्चारण में अधिक शुद्धता का ध्यान रखा जाता है। अशुद्ध उच्चारण से इसका दुष्प्रभाव भी हो सकता है।

* रामचरित मानस में मंत्र जप को भक्ति का 5वां प्रकार माना गया है। मंत्र जप से उत्पन्न शब्द शक्ति संकल्प बल तथा श्रद्धा बल से और अधिक शक्तिशाली होकर अंतरिक्ष में व्याप्त ईश्वरीय चेतना के संपर्क में आती है जिसके फलस्वरूप मंत्र का चमत्कारिक प्रभाव साधक को सिद्धियों के रूप में मिलता है।
श्रीरामचरित्र मानस में नवधा भक्ति का जिकर भी आता है। इसमें रामजी शबरी को कहते है की
‘मंत्र जप मम दृढ विस्वास ,
पंचम भक्ति सो वेद प्रकासा ‘
अर्थार्थ मंत्र जप और मुझमे पक्का विश्वास रखो।

* शाप और वरदान इसी मंत्र शक्ति और शब्द शक्ति के मिश्रित परिणाम हैं। साधक का मंत्र उच्चारण जितना अधिक स्पष्ट होगा, मंत्र बल उतना ही प्रचंड होता जाएगा।

* मंत्रों में अनेक प्रकार की शक्तियां निहित होती हैं जिसके प्रभाव से देवी-देवताओं की शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र एक ऐसा साधन है, जो मनुष्य की सोई हुई सुसुप्त शक्तियों को सक्रिय कर देता है।

केन्द्रो पर मंत्र प्रभाव
हमारे शरीर में ७ केंद्र होते है। उनमे से नीचे के में घृणा , ईर्ष्या, भय, स्पर्धा , काम आदि होते है। लेकिन मंत्र जप के प्रभाव से जपने वाले का भय निर्भयता में , घृणा प्रेम में और काम राम में बदल जाता है।

प्रथम केंद्र मूलाधार होता है।

दूसरा स्वाधिष्ठान केंद्र होता है इसमें चिंता निश्चिंता में बदलती है। तीसरा केंद्र मणिपुर है। जिससे रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है। क्षमा शक्ति विकसित होती है।

सात बार ओम या हरिओम मंत्र का गुंजन करने से मूलाधार केंद्र में स्पंदन होता है जिससे रोगो के कीटाणु नष्ट होते है। क्रोध के हमारी जीवनी शक्ति का नाश होता है। वैज्ञानिकों का कहना है की यदि एक घंटे तक क्रोध करनेवाले व्यक्ति के श्वासों के कण इकट्ठे करके अगर इंजेक्शन बनाया जाये तो उस इंजेक्शन से २० लोगो को मारा जा सकता है।

यदि एक घंटे के क्रोध से २० लोगो की मृत्यु हो सकती है तो एक घंटे के हरिनाम कीर्तन से असंख्यों लोगों को आनंद व् मन की शांति मिलती है। मंत्र शक्ति में आश्चर्य नही तो क्या है। मंत्रशक्ति के द्वारा ये सब संभव है।

मंत्र जप और स्वास्थ्य
लगातार मंत्र जप करने से उछ रक्तचाप, गलत धारणायें, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं| मंत्र जप का साइड इफेक्ट (Side Effect) यही है|
मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दिम करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है|
“क्लीं ह्रीं” इत्यादि बीजाक्षरों का एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर ह्रदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व् उनके विकार नष्ट होते हैं|

जप के लिये ब्रह्म मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय पूरा वातावरण शान्ति पूर्ण रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहर या शोर नहीं होता| कुछ विशिष्ट साधनाओं के लिये रात्रि का समय अत्यंत प्रभावी होता है| गुरु के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए| सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है|

अपूर्व आभा
मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे से एक अपूर्व आभा आ जाति है| आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वास्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगे, तो इसके परिणाम स्वरुप मुखमंडल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही|

जप माला
जप करने के लिए माला एक साधन है| शिव या काली के लिए रुद्राक्ष माला, हनुमान के लिए मूंगा माला, लक्ष्मी के लिए कमलगट्टे की माला, गुरु के लिए स्फटिक माला – इस प्रकार विभिन्न मंत्रो के लिए विभिन्न मालाओं का उपयोग करना पड़ता है|

मानव शरीर में हमेशा विद्युत् का संचार होता रहता है| यह विद्युत् हाथ की उँगलियों में तीव्र होता है| इन उँगलियों के बीच जब माला फेरी जाती है, तो लयात्मक मंत्र ध्वनि (Rythmic sound of the Hymn) तथा उँगलियों में माला का भ्रमण दोनों के समन्वय से नूतन ऊर्जा का प्रादुर्भाव होता है|

जप माला के स्पर्श (जप के समय में) से कई लाभ हैं –
* रुद्राक्ष से कई प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं|
* कमलगट्टे की माला से शीतलता एव अआनंद की प्राप्ति होती है|
* स्फटिक माला से मन को अपूर्व शान्ति मिलती है|

दिशा
दिशा को भी मंत्र जप में आत्याधिक महत्त्व दिया गया है| प्रत्येक दिशा में एक विशेष प्रकार की तरंगे (Vibrations) प्रवाहित होती रहती है| सही दिशा के चयन से शीघ्र ही सफलता प्राप्त होती है|

जप-तप
जप में तब पूर्णता आ जाती है, पराकाष्टा की स्थिति आ जाती है, उस ‘तप’ कहते हैं| जप में एक लय होता है| लय का सरथ है ध्वनि के खण्ड| दो ध्वनि खण्डों की बीच में निःशब्दता है| इस निःशब्दता पर मन केन्द्रित करने की जो कला है, उसे तप कहते हैं| जब साधक तप की श्तिति को प्राप्त करता है, तो उसके समक्ष सृष्टि के सारे रहस्य अपने आप अभिव्यक्त हो जाते हैं| तपस्या में परिणति प्राप्त करने पर धीरे-धीरे हृदयगत अव्यक्त नाद सुनाई देने लगता है, तब वह साधक उच्चकोटि का योगी बन जाता है| ऐसा साधक गृहस्थ भी हो सकता है और संन्यासी भी|

कर्म विध्वंस
मनुष्य को अपने जीवन में जो दुःख, कष्ट, दारिद्य, पीड़ा, समस्याएं आदि भोगनी पड़ती हैं, उसका कारण प्रारब्ध है| जप के माध्यम से प्रारब्ध को नष्ट किया जा सकता है और जीवन में सभी दुखों का नाश कर, इच्छाओं को पूर्ण किया जा सकता है, इष्ट देवी या देवता का दर्शन प्राप्त किया जा सकता है|

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Raksha (Protection) Mantra:

This mantra is known as Raksha – Suraksha OR Protection Mantra. This Mantra chanted by Jain Muni with Jain Mantras but I am sure anyone can play this Mantra with positive intent. I personally noticed its working and highly recommend to all.

आत्मरक्षाकर स्तोत्र

ऐसा माना गया है कि…घर से निकलते समय यदि यह मंत्र का ऑडियो भी सुन लिया जाये तो एक्सीडेंट होने की सम्भावना नहीं रहती व मृत्यु तुल्य दुर्घटना की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है । यात्रा प्रारम्भ करने से पहले यह स्तोत्र अवश्य ही
सुनना चाहिए ।

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DISCLAIMER: This is solely based on Numero study. Information gathered on individual cases are from online sources which may or maynot be accurate. In case of inaccuracy then one can ignore this study.

Please do note that remedies works best if Name number is best aligned with your date of birth.

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जानिए आपका कौन सा चक्र बिगड़ा है और उसे कैसे ठीक करे: –

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(1) मूलाधार चक्र- गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला ‘आधार चक्र’ है।आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता,धन,समृधि ,आत्मबल,शारीरिक बल,रोजगार कर्मशीलता,घाटा,असफलता रक्त एवं हड्डी के रोग,कमर व पीठ में दर्द ,आत्महत्या के बिचार,डिप्रेशन,केंसर अ।दि होता है।

(2) स्वाधिष्ठान चक्र- इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है ।उसकी छ:पंखुरियाँ हैं।इसके बिगड़ने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता,बाँझपन ,मंद्बुधिता,मूत्राशय और गर्भाशय के रोग ,अध्यात्मिक सिद्धी में बाधा बैभव के आनंद में कमी अदि होता है।

(3) मणिपूर चक्र- नाभि में दस दल वाला मणिपूर चक्रहै। इसके इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता,गुस्सा,चिंचिरापन, नशाखोरी,तनाव ,शंकलुप्रबिती,कई तरह की बिमारिया,दवावो का काम न करना,अज्ञातभय,चहरेक।तेजगायब ,धोखाधड़ी,डिप्रेशन,उग्रता
हिंशा,दुश्मनी,अपयश,अपमान,आलोचना,बदले की भावना ,एसिडिटी ,ब्लडप्रेशर,शुगर,थाईरायेड,सिर एवं शारीर के दर्द,किडनी ,लीवर ,केलोस्ट्राल,खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।

(4) अनाहत चक्र- हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है। इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़-फोड़, कुतर्क, चिन्ता,नफरत ,प्रेम में असफलता ,प्यार में धोखा ,अकेलापन ,अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी ,मन में उदासी, जीवन में बिरानगी ,सबकुछ होते हुए भी बेचैनी ,छाती में दर्द ,साँस लेने में दिक्कत,सुख का अभाव,ह्रदय व फेफड़े के रोग,केलोस्ट्राल में बढ़ोतरी आदि।

(5) विशुद्ध चक्र –कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है।यह सोलह पंखुरियों वाला है।यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष,अभिब्यक्तिमें कमी,गले,नाक,कान,दात, थाईरायेड, आत्मजागरण में बाधा आती है।

(6) आज्ञा चक्र – भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इसके बिगड़ने पर एकाग्रता,जीने की चाह,निर्णय की सक्ति, मानसिक सक्ति,सफलता की राह में अडचने आदि इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा ।

(7) सहस्रार चक्र -सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है। शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव,भाग्य का साथ न देना अदि ।

उपाय

अभिमंत्रित 7 चक्र ब्रेसलेट धारण किजये।

चक्रो को सही करने के लिए चक्र के बीज मंत्र के जाप करे।

नीचे उपाय के पिक्चर्स ओर मंत्र का लिंक दिया गया है।
7 Chakra Bracelet। 7 चक्र ब्रेसलेट


Chakra Beej Mantra। चक्र बीज मंत्र:

7 Chakra IMage with Beej Mantra

7 Chakra Beej Mantras:

Chakra-beej-mantras-the-sounds-of-the-chakras

Chakra Chanting Video

वास्तु और 7 चक्

अगर घर मे वास्तु दोष रहेगा तो उसकी वजह से भी चक्ररा इम्बलनसे हो सकते है।

नंबर्स और चक्र

आपकी जन्म तारीख में मिसिंग नंबर्स का भी नेगेटिव प्रभाव चक्रो पे हो सकता है।

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