Written By Acharya Vijay ShankarJi:

*———:मृत्यु से पुनर्जन्म की ओर:———*
***********************  भाग–1, 2 व 3  *******************

परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरूदेव अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्मज्ञानगंगा में पावन अवगाहन! पूज्य गुरुदेव व गुरु मां को कोटि कोटि नमन |

अमावस्या की काली अँधेरी रात। लगभग दो बजे का समय था। चारों ओर गहरी निस्तब्धता छाई हुई थी। कभी-कदा लावारिस कुत्तों के भोंकने की आवाज़ सुनाई दे जाती थी।
कुछ ही समय पहले श्मशान में एक चिता घण्टों धू-धू कर जलने के बाद बुझी थी। मगर राख अभी गरम थी। चिता में जलने वाली लाश की अधजली खोपड़ी को श्मशान के डोम चौधरी ने धकेल कर गंगा के गन्दे पानी में फेंका था। गंगा किनारे खड़े पीपल पर मांसखोर पक्षी सहसा ज़ोर से चीख उठा जिसकी आवाज़ सुनकर भोलागिरि महाशय चोंक पड़े और फिर अँधेरे में ही मेरी ओर इशारा किया। मैं दूसरे ही क्षण समझ गया और लपक कर उसी जगह पहुँच गया जहाँ पानी में डोम चौधरी ने लाश की अधजली खोपड़ी फेंकी थी। टटोलकर मैंने खोपड़ी निकाल ली और ला कर भोलागिरि महाशय को थमा दी।
एकान्त कमरे में लकड़ी की एक चौकी पर लाल रेशमी कपडा बिछाकर उसपर खोपड़ी रख दी गयी। फिर उसके सामने लोहबान, अगरबत्ती और चमेली के तेल का दीपक जलाया गया और खोपड़ी को माला पहनाई गयी। उसके बाद भोलागिरि ने लाल सिन्दूर से खोपड़ी पर एक अटपटा सा मन्त्र लिखा और काफी देर तक उसके सामने ध्यानस्थ बैठे रहे। भोलागिरि महाशय आत्मविद्या के महा पंडित और प्रेतशास्त्र के भारी विद्वान थे। मुझे(गुरुदेव) अपनी खोज और शोधकार्य में उनका सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त था। वे मेरे विशेष आग्रह पर उस रात एक भयंकर तान्त्रिक अनुष्ठान की योजना कर रहे थे। यह अनुष्ठान अपने आप में अत्यन्त रहस्यमय था। वे उस खोपड़ी के माध्यम से उसकी आत्मा का आवाहन कर मृत्यु की बाद की स्थितियों से अवगत होना चाहते थे। मैं उनके संकेत पर कमरे के एक कोने में आसन जमा कर मौन साधे बैठा था और उनकी गतिविधि को आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहा था।
ध्यान भंग होने पर भोलागिरि महाशय ने थैले में रखी शराब की बोतल निकाली और पूरी शराब दंहकते हुए कोयले की आग में उडेेल दी। फिर उसी के साथ ढेर सारा लोहबान आग में डाल दिया। धुएँ का एक गुबार सा उठा और चारों ओर फ़ैल गया। शराब और लोहबान की मिली-जुली गन्ध कमरे में चारों ओर फ़ैल गयी। वातावरण एकबारगी रहस्यमय हो उठा और उसी के साथ किसी की फिस फिस कर बोलने की आवाज़ सुनाई दी।

*भाग–2*

वह घुटी-घुटी सी आवाज़ किसकी थी ?–मैं समझ न पाया। तभी गिरि महाशय का गम्भीर स्वर गूंज उठा–कौन हो तुम ? क्या नाम है तुम्हारा ? तुम्हारी मृत्यु कैसे हुई ?
मुझे समझते देर नहीं हुई–खोपड़ी की आत्मा वहां आ गयी थी। स्याह धुएँ की आकृति जो किसी औरत की शक्ल में थी, मैं स्पष्ट सामने देख रहा था। वह आकृति खोपड़ी के नजदीक खड़ी झूल रही थी। टंगे हुए कपडे की तरह हिल-डुल रही थी।
मैं स्थानीय कॉलेज की एक अध्यापिका हूँ। मेरा नाम सुषमा अग्निहोत्री है। संसार में मेरा कोई नहीं है। जीवन में असफल होकर स्वयं आत्महत्या की थी मैंने। मुझे यहाँ इस तरह क्यों बुलाया गया है ?
कुछ रहस्यमय बातों की जानकारी के लिए तुम्हें बुलाया गया है। आप एक पढ़ी-लिखी महिला हैं और मुझे विश्वास है कि आप मेरे प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभवों के अनुसार सही सही देंगी।
क्या जानना चाहते हैं आप ?
आपने आत्महत्या कैसे की ?
ढेर सारी नींद की गोलियां खाकर।
गोलियां खाकर तुरंत आपके मन में कौन सा विचार आया था ? क्या सोचा था तुरंत आपने ?
आह ! मैंने बहुत भारी भूल की। ऐसा मुझे नहीं करना चाहिए था। अब क्या होगा ? मेरी आत्मा मौत की तमाम भयंकर तकलीफों को कैसे सहन करेगी ? मगर नहीं, ऐसा सोचना मेरा भ्रम था। मौत न भयानक होती है और न कष्टदायिनी ही। मौत के सम्बन्ध में जरुरी ज्ञान न होने के कारण ही वह डरावनी और भयानक लगती है। सुषमा की आत्मा ने आगे कहा– मनुष्य चेतन है। इसलिए उसका एक ही स्थिति में बराबर बने रहना सम्भव नहीं है। प्रकृति के सब रूपों में परिवर्तन बराबर होता रहता है तो जीवनयात्रा में गतिशीलता बराबर क्यों नहीं रहेगी ? यात्राक्रम के इन पड़ावों को ही हम जीवन और मृत्यु कहते हैं। इसमें न कुछ अप्रत्याशित है और न आश्चर्यजनक। फिर मरण से भय किस बात का ? वास्तव में मृत्यु के सम्बन्ध में लोग विचार ही नहीं करते। उसकी संभावनाओं और तैयारी के विषय में उपेक्षा बरतते हैं। फलतः समय आने पर मृत्यु् अविज्ञात रहस्य के रूप में सामने आती है जो भयानक और कष्टदायक होती है। अज्ञात की ओर बढ़ने और विचार करने पर ही महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं। इतिहास उन व्यक्तियों और महापुरुषों से भरा पड़ा है जिन्होंने जनप्रवाह के विपरीत अज्ञात दिशा में बढ़ने का साहसभरा पुरुषार्थ दिखाया है।
मृत्योपरान्त जीवन के अस्तित्व को अपनी योगसाधनाओं के माध्यम से देखकर आत्मा के अजर-अमर होने की घोषणा की गयी है। इस तथ्य की पुष्टि अब परामनोविज्ञान नवीन शोधों के द्वारा कर रहा है।
सुषमा अग्निहोत्री की आत्मा ने आगे बतलाया–मरने के पहले जो भय था, वह मरने के बाद समाप्त हो गया। शरीर छूटने की अनुभूति मुझे स्पष्ट रूप से हुई। मरणकाल की घडी न कष्टदायक है और न कौतूहल पूर्ण। इसे असह्य कहने जैसी कोई बात नहीं है जैसा कि कुछ पुस्तकों में बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया है। सब कुछ उतनी ही सरलता से उपलब्ध हो जाता है जितना कि रात्रि में सोते समय वस्त्रों(खासकर गीले) का उतारना।
शरीर से अलग होने के बाद मुझे काफी हल्कापन अनुभव हुआ। काफी देरतक मैं लाल और नीले रंग के गोले में घिरी रही। मेरे शरीर में खास कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। वह शरीर वैसा ही था जैसा कभी मेरा पार्थिव शरीर था। मैं उस नए शरीर में इच्छाओं, कामनाओं, विचारों को तीव्रता से अनुभव कर रही थी और अभी भी कर रही हूँ। मुझे शरीर और संसार से अलग हुए 16 घंटे ही हुए हैं और इन 16 घण्टों में शान्ति का जो अनुभव हुआ है–वह विचित्र है, बतला नहीं सकती। अब मुझे जाने दीजिये।
(सुषमा अग्निहोत्री की आत्मा को मृत्यु के बाद जो अनुभव हुए, वे उनके व्यक्तिगत अनुभव थे या हैं। यह आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति के अनुभव सुषमा जैसे ही हों। हर व्यक्ति अलग है, उसके विचार अलग हैं, संस्कार और कर्म अलग हैं। हो सकता है कि व्यक्ति व्यक्ति के मरणोत्तर अनुभव अलग अलग होते हों।)
मरणोत्तर जीवन के और पुनर्जन्म के भारतीय सिद्धांतों पर विश्वास कर पश्चिम के परामनोवैज्ञानिक उनका विश्लेषण करने के लिए प्रयत्नशील हैं। पुनर्जन्म का बुनियादी आधार है–गीता। इसके अनुसार जीव अपने कर्म और संस्कारों के अनुसार नवीन देह धारण करता है।

*भाग–3*

यद्यपि मुसलमान पुनर्जन्म के बारे में कोई विश्वास नहीं करते, फिरभी उनमें जो सूफ़ी संप्रदाय है, वे लोग पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। सन्त मौलाना जलालुद्दीन ने कहा था–मैं हज़ारों बार इस धरती पर जन्म ले चुका हूँ। इसी तरह ईसाई धर्म भी पुनर्जन्म नहीं मानता, परन्तु पश्चिमी देशों के कई विख्यात दार्शनिकों ने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को स्वीकार किया है।
एडविन आर्नोल्ड ने आत्मा के अमरत्व पर अपने विचार कुछ इस तरह व्यक्त किये थे–आत्मा अजन्मा और अमर है। कोई ऐसा समय नहीं था जब यह नहीं थी। इसका अन्त और आरम्भ स्वप्नमात्र है। मृत्यु ने इसे कभी स्पर्श नहीं किया। यदि हम आत्मा की अमरता पर विश्वास कर लेते हैं तो पुनर्जन्म के बारे में अनास्था का प्रश्न ही नहीं उठता।
मृत्यु के बाद वास्तव में क्या होता है ?–इस विषय पर भी वैज्ञानिक लोग जीव विज्ञान की प्रयोगशालाओं में वर्षों से प्रयोग कर रहे हैं। अमेरिका के ‘विलसा क्लाउड चेम्बर’ के शोध से बड़े आश्चर्यजनक तथ्य सामने आये हैं जिससे वैज्ञानकों को यह बात स्वीकार करनी पड़ी कि मरने के बाद भी किसी न किसी रूप में जीव का अस्तित्व बना रहता है।

विशेष—ऑटोरियो कनाडा के मानव सम्पदा के निर्देशक ‘हर्वग्रिफिन’ दिल के मरीज थे। सन् 1974 में उन्हें तीन दौरे पड़े और फिर 20 बार से अधिक दौरे पड़े। हर बार डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित किये जाने पर कुछ ही मिनटों बाद वे पुनः जीवित हो उठते थे। डॉक्टरों ने उनकी घटना को ‘अनहोनी घटना’ के रूप में स्वीकार किया। मृत्यु के बाद उन्हें जो अनुभूति हो रही थी, वह लगभग एक-सी थी। ग्रिफिन का कहना है कि प्रत्येक मृत्यु के बाद उन्होंने अपने को ‘उज्जवल तेज प्रकाश’ से घिरा हुआ पाया, जिसमें गर्मी की अनुभूति होती थी। मुझे याद् है कि वह बिजली के कड़कने से निकलने वाले प्रकाश जैसा था। ध्यान से देखने पर पाया कि यह मेरी ओर बढ़ रहा है। मेरे और प्रकाश के बीच एक काली सी छाया थी जो उस तेज प्रकाश से मेरी रक्षा कर रही थी। उस समय हमने स्वयं को एक मुड़े हए शरीर के रूप में अनुभव किया। इसके साथ ही काली छाया के तैरने की अनुभूति हो रही थी। इतने में पुनः वह उज्जवल प्रकाश मेरी ओर बढ़ा। डर तो नहीं लगा पर रहस्यात्मक अनुभूति से मैं रोमांचित हो उठा। सोच रहा था कि कहीं वह प्रकाश मुझे पूरी तरह से घेर न ले। ठीक उसी समय हमारा एक पुराना परिचित वहां प्रकट हुआ जिसे मैं छू सकता था। उसने निडर भाव से कहा–जाओ, सब ठीक है। अचानक मुझे सीने पर तेज आघात महसूस हुआ, आवाज़ भी सुनाई दी–क्या बिजली के झटके दिए जाएँ। दूसरी ओर से आवाज आई–नहीं, अभी नहीं, इसकी पलकें झपक रहीं हैं। इसकी आयु अभी पूरी नहीं हुई है। इसे जिन्दा रहना चाहिए। इसके बाद मैं अस्पताल में पड़े अपने शरीर में मैं वापस आ गया।

ग्रिफिन की अनुभूति अस्पष्ट होते हुए भी मरणोत्तर जीवन का ही नहीं, एक ऐसे लोक के अस्तित्व का प्रतिपादन करती है जहाँ स्थूल शरीर की मर्यादाएं समाप्त हो जाती हैं। मृत्यु को जीवन का अन्तिम अतिथि मानकर उसके स्वागत की पूरी तैयारी की जाती रहे। उसके साथ सुखद प्रयासों के लिए आवश्यक साधन जुटाने में तत्परता बरती जाय तो मृत्यु वैसी ही आनंददायक होगी जैसे सुन्दर सुरम्य स्थानों में पर्यटन करना आनंददायक होता है।

भाग–4, 5, 6
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ग्रिफिन के इस प्रयोग के अंतर्गत एक ऐसा सिलेंडर लिया जाता है जिसकी भीतर की परतें विशेष चमकदार होती हैं। फिर उसमें कुछ रसायिनिक घोल डाले जाते हैं जिसके फलस्वरूप भीतर एक विशेष प्रकार की चमकदार गैस फ़ैल जाती है। इस गैस की यह विशेषता है कि यदि कोई परमाणु या इलेक्ट्रॉन इसके भीतर प्रवेश करे तो शक्तिशाली केमरे द्वारा उसका चित्र उतार लिया जाता है।
प्रयोग के लिए उसमें एक चूहा रखा गया। फिर बिजली का करेंट लगाकर उसे मार डाला गया। चूहे के मरने के बाद उस सिलेंडर का चित्र उतारा गया। वैज्ञानिक लोग यह देखकर आश्चर्यचकित हुए कि मृत्यु के बाद गैस के कुहरे में भी मृत चूहे की धुंधली आकृति तैर रही थी। वह आकृति वैसी ही हरकतें कर रही थी जैसी जीवित अवस्था चूहा करता था। इस प्रयोग से यह सिद्ध हो गया कि मृत्यु के बाद भी प्राणी की सत्ता किसी न किसी रूप में अवश्य विद्यमान रहती है। विख्यात तत्वदर्शी, चिन्तक और मनोवैज्ञानिक कार्ल-युंग का एक रहस्यमय विचित्र अनुभव सुनिए–
सन् 1944 में मुझे दिल का दौरा पड़ गया था। डॉक्टरों के अनुसार मैं मृत्यु के मुख में था। जब मुझे ऑक्सीजन और इंजेक्शन दिये जा रहे थे तब मुझे अनेक विचित्र अनुभव हुए। कह नहीं सकता कि मैं अचेतावस्था में था कि स्वप्नावस्था में। पर मुझे स्पष्ट अनुभूति हो रही थी कि मैं अंतरिक्ष में लटका हुआ हूँ और अपने से करीब एक हज़ार मील नीचे स्थित येरूशलम नगर को साफ़ देख रहा हूँ।
फिर मुझे लगा कि मेरा सूक्ष्म शरीर एक पूजा घर में प्रवेश कर रहा है। पूजा का कक्ष प्रकाशमय था। मुझे लग रहा था कि मैं असीम इतिहास का एक खण्ड हूँ और अंतरिक्ष में कहीें विचरण करने की क्षमता रखता हूँ। तभी मुझे अपने ऊपर एक छाया मंडराती हुई दिखाई दी। वास्तव में वह छाया मेरे डॉक्टर की थी। मुझे लगा कि डॉक्टर मुझसे कह रहा है कि तुमको शीघ्र अपने भौतिक शरीर में लौट आना है और जैसे ही मैंने इसका पालन किया, कि मुझे लगा–अब मैं स्वतंत्र नहीं हूँ और मेरा बन्दी जीवन फिर से प्रारम्भ हो गया है। इस अलौकिक अनुभव के कारण जो अन्तर्दृष्टि मुझे प्राप्त हुई, उसने मेरे सारे संशयों का अन्त कर दिया और मैंने जान लिया कि जीवन की समाप्ति पर क्या होता है ? निश्चय ही हमारे जगत में एक चौथा आयाम है जो अनोखे रहस्यों से भरा है।

भाग–5
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मृत्यु के बाद की स्थिति और पुनर्जन्म के पूर्व की स्थिति–कह सकते हैं–एक दूसरे की पूरक होती हैं। मृत्यु के बाद पुनर्जन्म निश्चित है और जन्म के बाद उसकी मृत्यु भी निश्चित है।
जो बच्चे अपनी पूर्व जन्म की बातें बतलाते हैं, उनके विषय में खोज करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि पूर्वजन्म की स्मृति का कारण है व्यक्ति या बालक की इन्द्रियातीत शक्ति। जिस व्यक्ति या बालक में मस्तिष्क शक्ति की अति प्रबलता होती है, उसे अपने पूर्व जन्म का भान हो उठता है।
मृत्यु के बाद से लेकर पुनर्जन्म तक की जीवात्मा की यात्रा निस्संदेह रहस्यमयी होती है। यात्रा के बीच की स्थितियां और अवस्थाएं निश्चय ही रहस्यपूर्ण और तिमिराच्छन्न हैं। वैज्ञानकों और परामनोवैज्ञानिकों के पास इनका कोई समाधान नहीं है और न तो है इन प्रश्नों का उत्तर ही कि मृत्यु के बाद आत्मा कहाँ जाती है ? क्या शरीर के अन्त के साथ जीवन का भी अन्त हो जाता है या शरीर नष्ट हो जाने के पश्चात् आत्मा नयी देह धारण करती है ?–ये और ऐसे ही अनेक प्रश्न हैं जो आदि काल से मानव मस्तिष्क में बराबर उपजते रहे हैं और जिनका केवल आध्यात्मिक स्तर पर उत्तर मिल सका है लेकिन वैज्ञानिक स्तर पर उत्तर आजतक नहीं मिल सका है। विज्ञान यहाँ पर बिलकुल मूक है अभीतक।
सुषमा अग्निहोत्री की मृतात्मा ने मृत्यु के बाद की परिस्थितियों का जो वर्णन किया, उससे एक बात की आशा हो गयी कि तंत्र के मार्ग पर चलकर ही आश्चर्य और कौतूहल से भरे उन परिस्थितियों का पता चल सकता है जो मृत्यु के बाद और पुनर्जन्म के पूर्व की यात्रा के बीच जीवात्मा के सामने उत्पन्न हुआ करती हैं।
सावन-भादों का महीना था। गंगा खूब हिलोरें मार रही थी, दहाड़ रही थी। जब श्मशान पहुंचा तो देखा कि वहां कई लाशें जलने के इंतज़ार में पड़ी हुई थीं। दर्जनों चिताएं जल भी रही थीं। उन चिताओं और लाशों के बीच एक ऊँचे तख़्त पर गद्दी लगाये चौधरी पन्नालाल शराब पी रहे थे और नौकरों को गालियाँ बक रहे थे मगर मुझे देखते ही शराब की बोतल एक ओर रख दी और बोले–पा लागी महाराज ! आवा, कहाँ रहला इतना दिन…?
गद्दी के करीब बैठ गया मैं। तभी जलती हुई लाश की दुर्गन्ध का एक तेज भभका आया और मन-मस्तिष्क पर छा गया एक बारगी। जी मिचला उठा मेरा। जब सब लोग चले गए तो चौधरी ने बतलाया कि उन्होंने एक खोपड़ी की मेरे लिए जुगाड़ कर रखी है और यह भी बतलाया कि खोपड़ी किसी जवान शादीशुदा औरत की है जिसने बंगाल के किसी तान्त्रिक साधू के चक्कर में पड़कर आत्महत्या कर ली थी।
मैंने खोपड़ी लेकर तुरन्त थैले में डाल ली और भोलागिरि महाशय के पास पहुंचा। रात के करीब दस बज रहे थे। गली करीब करीब सुनसान हो गयी थी।थैले से निकालकर खोपड़ी उनके सामने रख दी। एक ही साँस में शराब की पूरी बोतल खाली कर दी उन्होंने और फिर बोले–जा, लेजा, शराब में डुबाकर रख दे इसे। मैं तुरंत दूसरे कमरे में जाकर एक बड़े वर्तन में सारी शराब उढ़ेलकर उसमें खोपड़ी को डुबाकर रख दिया और वापस लौट आया।
दीपावली की रात आई। तान्त्रिक क्रिया शुरू हुई। धीरे धीरे गम्भीर वातावरण रहस्यमय हो उठा। दीपक की पीली लौ एकबार कसमसाई और स्थिर होकर जलने लगी। गिरि महाशय ने महापात्र में मदिरा पान किया और शंख की माला पर कोई मन्त्र जपने लगे। भय और आतंक से मेरा चित्त भर गया।
कोई दस मिनट के बाद फिस्स फिस्स की धीमी आवाज़ सुनाई दी। संभल गया मैं। गिरि महाशय की ओर देखा–उनका चेहरा लाल हो उठा था। एकाएक उनका स्वर गूंज उठा–कौन हो तुम ?
मैं..मैं पश्चिम बंगाल से आई हूँ।
क्या नाम है तुम्हारा ?
ललिता.. ललिता सान्याल।
तुमने आत्महत्या की है ?
हाँ–इतना कहकर ललिता की आत्मा सिसकने लगी।
क्यों आत्महत्या की तुमने ?
आप तंत्रसाधक हैं, स्वयं समझ सकते हैं इसे।
नहीं, तुम बतलाओ मुझे कारण।
ललिता की आत्मा ने सिसकते हुए भरे कण्ठ से जो कुछ बतलाया, उसने मेरी अन्तरात्मा को झकझोर कर रख दिया। उसकी कथा यहाँ देना विषयांतर हो जायेगा। सबकुछ सुन लेने के बाद गिरि महाशय बोले–आत्महत्या करने के बाद तुम्हें कैसा लगा था ?
मैं बहुत दिनों तक यही नहीं जान सकी कि मेरी मृत्यु हो चुकी है और मुझसे दुनियां का कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है। और जब इसका ज्ञान हुआ तो मैंने तत्काल अपने आपको एक नीरव वातावरण में पाया। चारों ओर एक विचित्र सी शान्ति छाई हुई थी। उस अवस्था में मुझे अपने शरीर की याद आई और उसके प्रति मेरा मोह जाग गया। मैंने अपने शरीर को बहुत खोजा लेकिन मुझे नहीं मिला। नदी के जिस स्थान पर मैंने आत्महत्या की थी, वहां एक बहुत विशाल पीपल का पेड़ था। मैं उसी पेड़ पर कुछ दिन रही और फिर वहां से भटकती हुई गंगा किनारे श्मशान में आ पहुंची। वहां पहुँचते ही मुझे दो आदमी खोजते हुए आ पहुंचे। उनका रंग काला था। सिर काफी बड़े और मुड़े हुए थे। उनकी आकृति काफी भयानक थी। दोनों ही मुझे घसीटते हुए ले चलने लगे। दोनों ही नंगे थे। मैं काफी रोई-चिल्लाई-गिड़गिडाई मगर इन सबका उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ा।
वे दोनों मुझे एक ऐसी जगह ले गए जहाँ हज़ारों औरतों और मर्दों की भीड़ थी। पता चला कि वे लोग भी मेरी ही तरह आत्म हत्या कर वहां पहुंचे थे। किसी की जीभ बाहर झूल रही थी तो किसी की आँखें बाहर की ओर निकल रही थीं, किसी की गर्दन ही काफी झूलकर लम्बी हो गयी थी। सभी आत्महत्या के लिए घोर पश्चाताप कर रहे थे। मैंने देखा–संसार में जिस तरह से लोगों ने आत्महत्या की थी, उन लोगों की अलग अलग भीड़ थी। रेल से कटकर मरने वालों की अलग, जहर खाकर मरने वालों की अलग। ऊँचे से कूदकर मरने वालों की अलग, अस्त्र-शस्त्र से मरने वालों की अलग। सभी के सामूहिक पश्चाताप का प्रभाव मुझ पर पड़ा और मैं रोने लगी। उस समय मेरे कष्ट की कोई सीमा नहीं थी।
जब मुझे यह पता चला कि मुझे यहाँ तबतक रहना पड़ेगा, जबतक संसार में बाक़ी मेरी आयु समाप्त नहीं हो जायेगी। एक दिन मुझे ऐसा लगा कि मेरे भौतिक शरीर की खोपड़ी किसी कापालिक के हाथ लग गयी है और वह उसे लेकर काशी गया है। शायद वह कोई साधना करेगा। बात सच निकली। काशी के श्मशान घाट पर धूनी रमाये वह कापालिक मेरी खोपड़ी सामने रखकर कोई मन्त्र जप रहा था, तभी मैं वहां पहुँच गयी और मैंने उस कापालिक को जोर से धक्का दिया। वह एक ओर लुढ़क गया। फिर उठकर चीखता-चिल्लाता भय से कांपता हुआ एक ओर भागा। उसके बाद मैं इस वातावरण में अपने आपको महसूस कर रही हूँ। मुझे यहाँ थोड़ी शान्ति मिल रही है।
तुम्हारी आयु कितनी शेष है ?
अभी पचपन वर्ष, नौ महीने और तीन दिन शेष है।
मृत्यु के समय कितनी आयु थी तुम्हारी ?
सिर्फ चौबीस वर्ष तीन महीना।
क्या तुम इसी तरह शेष आयु में शान्ति अनुभव करना चाहती हो ?
हाँ, मगर कौन देगा मुझे शान्ति, कौन हरेगा मेरा दारुण कष्ट, कौन है मेरी सहायता करने वाला ?
यह सुनकर गिरि महाशय ने उंगली से मेरी ओर इशारा करते हुए कहा–यह व्यक्ति..यह व्यक्ति तुमको शान्ति देगा, तुम्हारे सभी कष्टों को दूर करेगा और तुम्हारी पूरी सहायता करेगा। बोलो, तैयार हो ?
हाँ, मैं तैयार हूँ।

भाग–6
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ठीक है, मैं तैयार हूँ–इतना कहकर ललिता सान्याल की आत्मा वापस चली गयी। उसके जाते ही गिरि महाशय ने उसकी खोपड़ी में मदिरा डाली और उसे मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा–अपनी एक विलक्षण सिद्धि दे रहा हूँ–अलौकिक सिद्धि है यह। सारी मदिरा एक ही सांस में पी डालो।
मैंने खोपड़ी कांपते हाथों से ले ली और एक ही सांस में गट गट कर सारी मदिरा पी गया। सारा शरीर एकबारगी झनझना उठा। कलेजा भी जल उठा उसी के साथ।
जब मैंने शराब पी ली गिरि महाशय आगे बोले– अब और आज से ललिता की आत्मा तुम्हारे साथ रहेगी। उसकी खोपड़ी में इसी तरह मदिरा पीकर तुम उससे कभी भी संपर्क स्थापित कर सकते हो। लेकिन हाँ, इस खोपड़ी का बराबर ख्याल रखना। टूटने न पाये और खोने भी न पाये।
प्रसन्नता से झूम उठा मैं। एक बहुत बड़ी सिद्धि मिल गयी थी मुझे। लेकिन उस समय यह नहीं सोचा कि यही अलौकिक सिध्दि मेरे जीवन में बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर देगी।
उसी समय से ललिता की प्रेतात्मा मेरे साथ रहने लगी, मगर उसके अस्तित्व की अनुभूति मुझे न होती। अनुभूति तभी होती जब मैं उसकी खोपड़ी में भरकर रात के समय मदिरा पान करता। अनुभूति तो होती ही, उसके आलावा उस समय कोमल स्पर्श का भी अनुभव होता। ऐसा लगता–कोई कोमलांगी अपनी कोमल उँगलियों से मेरे अंगों को धीरे धीरे सहला रही है।
गिरि महाशय की मंत्रशक्ति से ललिता की आत्मा की शान्ति एकाएक बढ़ जाती थी और उसका अगोचर सम्बन्ध मदिरा पान करने पर मेरे सूक्ष्म शरीर से स्थापित हो जाता था और उस समय मैं जिस खोपड़ी की आत्मा को उसके माध्यम से बुलाना चाहता था, उसे वह लाकर उपस्थिति कर दिया करती थी।

भाग-7 व 8
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पहली बार मैंने ललिता की आत्मा के माध्यम से जिस खोपड़ी की आत्मा को बुलाया था, वह किसी पढ़े-लिखे कुलीन ब्राह्मण की थी। नाम था–सरजू पाण्डेय। आयु थी चालीस वर्ष के करीब।
सरजू पाण्डेय ने आत्महत्या तो नहीं की थी, मगर उन्हें जहर देकर मार डाला गया था और वह जहर भी दिया गया था उनकी पत्नी कौशल्या के द्वारा। मगर क्यों ? इसलिए कि वह अपने देवर जिसका नाम था राम प्रसाद पाण्डेय–से प्रेम करती थी। वह अपने पति को अपने प्रेम के बीच कांटा नहीं बनने देना चाहती थी। सरजू पाण्डेय काफी पढ़े-लिखे, समझदार व्यक्ति थे। वह इस अवैध सम्बन्ध के बारे में जानते थे, मगर जानबूझकर वह चुप थे। इनसान सबकुछ बर्दाश्त कर सकता है पर अपनी पत्नी की चरित्रहीनता को कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। आखिर एक दिन विस्फोट हो ही गया जिसके फलस्वरूप सरजू पाण्डेय को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
इस प्रसंग में सर्वथा एक नयी रहस्यमयी बात का पता चला–वह यह कि जिस किसी की हत्या का रहस्य रहस्य ही बना रह जाता है और पुलिस उस रहस्य का पता नहीं लगा पाती है या किसी की हत्या को लोग साधारण मृत्यु या आत्महत्या मानकर मौन साध जाते हैं, ऐसी स्थिति में मृतात्मा को बहुत कष्ट होता है। ऐसी मृतात्माएँ कभी-कभी अपनी अदृश्य इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं ऐसा वातावरण या परिस्थितियां उत्पन्न कर देती हैं जिससे हत्या का सारा रहस्य खुल जाता है और अपराधी को दण्ड भी मिल जाता है।
सरजू पाण्डेय की तड़पती आत्मा ने भी ऐसा ही किया था। उसके मामले को आत्महत्या मानकर पुलिस ने अपनी छानबीन बंद कर दी थी। गांव बाले भी चुप हो गए थे। सभी ने समझ लिया कि किसी कारणवश सरजू पाण्डेय ने आत्महत्या कर ली है।
मगर सरजू पाण्डेय की आत्मा चुप नहीं बैठी। वह अपने भाई और अपनी पत्नी के मस्तिष्क पर अपना प्रभाव डालने लगी जिसका परिणाम यह हुआ कि आये दिन उनमें आपस में झगडे होने लगे। एक दिन झगड़ा मारपीट में बदल गया और इसी तरह एक दिन एक दूसरे पर लांछन लगाकर सरजू पाण्डेय की हत्या का रहस्य उगल दिया दोनों ने।
सरजू पाण्डेय की आत्मा ने बतलाया कि दोनों पर केस चल रहा है। मैं जानता हूँ कि क्या होगा अन्त में। राम प्रसाद को फांसी होगी और और कौशल्या को होगा आजीवन कारावास। वैसे अभी मैं स्वतंत्र हूँ मगर शीघ्र ही अपने गांव के मुखिया रमापति की बहू मालती के गर्भ से जन्म लेने वाला हूँ। मैं बराबर मालती के आसपास चक्कर लगाया करता हूँ।
क्यों चक्कर लगाया करते हो ?
सरजू की मृतात्मा ने बतलाता कि मालती के गर्भ में पलने वाले जिस शिशु के रूप में जन्म लेने वाला हूँ, उसके शरीर का निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है। जब शरीर की रचना पूरी हो जाती है, प्राणों का संचार पूर्णतया नस-नाड़ियों में हो जाता है और ह्रदय और मस्तिष्क में भी पूर्णतया रक्तसंचार होने लगता है तभी आत्मा जन्म लेने के दो-तीन घंटे पहले शरीर में प्रवेश करती है और उसीके बाद से माँ के पेट में प्रसवपीड़ा होना आरम्भ हो जाती है और दो-तीन घंटे के भीतर शिशु जन्म ले लेता है।

भाग–8
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क्या तुम मालती के आलावा और किसी के गर्भ में प्रवेश नहीं कर सकते ?–मैंने प्रश्न किया।
इस प्रश्न के उत्तर में सरजू की आत्मा ने जो बतलाया उसका सारांश यह था कि आत्मा को अपनी इच्छानुसार किसी भी गर्भ में प्रवेश करने की स्वतंत्रता नहीं होती। कोई अदृश्य शक्ति बराबर इसके लिए रोकती रहती है। इसी प्रकार दूसरी ओर कर्म और संस्कार के अनुकूल गर्भ में प्रवेश करने के लिए भी प्रेरित करती रहती है। मतलब यह कि आत्मा अपनी इच्छानुसार मनचाहे गर्भ में प्रवेश कर जन्म नहीं ले सकती। इसके लिए वह किसी अदृश्य शक्ति के बन्धन में परतन्त्र रहती है।
जब मैंने सरजू पाण्डेय की आत्मा से यह पूछा कि मृत्यु के क्षण से लेकर गर्भ में प्रवेश करने से पूर्व तक तुम्हें क्या क्या अनुभव हुए और किन् किन् अवस्थाओं और परिस्थितियों से गुजरना पड़ा तो इस पर उसने बतलया —
मुझे रात के समय दूध में जहर दिया गया था। दूध पीने के थोड़ी देर बाद जैसे ही मैं खाट पर लेटा, मुझे चक्कर-सा आने लगा और उसीके साथ पेट और सीने में भी भयंकर दर्द होने लगा। फिर कब और किस क्षण मैं चेतनाशून्य हो गया बतला नहीं सकता और जब चेतना लौटी तो मैंने अपने शरीर को चिता में जलते हुए देखा। वहां गांव वालों और परिवार वालों की भीड़ थी। मैं भी जाकर अपनी चिता के सामने खड़ा हो गया। मुझे अपने शरीर को जलते हुए देखकर काफी दुःख हो रहा था। विवश था, कर ही क्या सकता था ?
जब मेरी चिता जल गयी और सब लोग वापस लौट आये तो श्मशान में मुझे विचित्र रूप रंग के तीन-चार व्यक्ति दिखाई दिए। वे काफी लम्बे थे–कम से कम सात फ़ीट के अवश्य रहे होंगे। उनके शरीर का रंग लाल था। छाती चौड़ी थी। सिर कोहड़े की तरह और मुड़ा हुआ था। सिर पर कम से कम दो फ़ीट की लम्बी चुटिया थी जो कमर तक लटक रही थी। आँखें बड़ी बड़ी और गूलर की तरह लाल थीं। नाक थोड़ी बाहर की ओर निकली हुई थी और नीचे का जबड़ा लटक रहा था।
वे लोग मेरी ओर बढ़ रहे थे। सभी की नज़रें मेरी ओर लगी हुई थीं। जब वे निकट आये और मुझे पकड़ने के लिए लपके तो मैं डरकर वहां से भागा। मगर वे लोग बहुत शक्तिशाली थे। उन लोगों ने मुझे घेरकर पकड़ लिया। रोने लगा मैं। एक ने मुझे डाँटकर कहा–चुप, चल हम लोगों के साथ। वे लोग मुझे पकड़कर एक ऐसे स्थान पर ले गए जहाँ एक ओर तो ऊँचे ऊँचे हरे-भरे वृक्ष थे और दूसरी ओर काफी लम्बा-चौड़ा मैदान था। उस मैदान में सैकड़ों आदमी इकट्ठे थे। शायद उन लोगों को भी मेरी तरह पकड़कर लाया गया था। उन्हें तरह तरह की यातनायें दी जा रही थीं उस समय। लेकिन न कोई चीख-चिल्ला रहा था और न कोई कुछ बोल पा रहा था। सभी मूक होकर यातना सहन कर रहे थे। मुझे भी एक ओर बैठा दिया गया था। मुझे भी यातना मिलेगी–यह सोच कर मैं कांप रहा था। उसी समय मुझे जोर की भूख लगी। मैंने राक्षस जैसे उस व्यक्ति से खाना माँगा। मगर खाना देने के बजाय उसने कस कर मेरी पीठ पर लात जड़ दी और फिर बोला–खाना खायेगा ? कभी किसीको तूने खाना खिलाया भी है जो यहाँ खाना मांग रहा है !
उस लम्बे-चौड़े मकान के एक ओर बड़ा-सा महल था–लाल पत्थरों का बना हुआ। ऊँची ऊँची दीवारें थी। महल में जाने के लिए बड़े बड़े दो फाटक थे। महल में पहले फाटक से लोगों को ले जाया जा रहा था और दूसरे फाटक से उन्हें बाहर कर दिया जाता था। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि भीतर जाने वाला व्यक्ति जब बाहर निकलता था तो उसका रूप-रंग बदला हुआ होता था। कुछ देर बाद मेरी भी बारी आई। मुझे भी पकड़कर भीतर ले जाया गया। पूरे महल में भीतर हल्के गुलाबी रंग का प्रकाश फैला हुआ था। एक काफी लम्बे-चौड़े कमरे में बहुत बड़ा तख़्त बिछा हुआ था जो पुराने ज़माने के राज सिंहासन जैसा था जिसपर लाल रंग की मखमली चादर बिछी हुई थी। उसपर एक काफी मोटा-ताजा भयानक शक्ल-सूरत का व्यक्ति बैठा था जिसे घेरकर भयानक शक्ल के चार-पांच व्यक्ति खड़े थे।
तख़्त पर बैठे हुए उस भयानक व्यक्ति को देखकर मैं पत्ते की तरह कांपने लगा। मेरी घिग्घी बंध गयी। मुझे लाकर उसी व्यक्ति के सामने खड़ा कर दिया गया। जो लोग मुझे वहां ले गए थे, उन्होंने न जाने किस भाषा में मेरे सम्बन्ध में उससे बातें कीं। वह बातें सुन कर बीच बीच में सिर हिलाता जा रहा था। अन्त में उसने कोई आदेश दिया जिसे मैं समझ न सका। मगर जैसे ही मुझे उसके सामने से हटाया गया और दूसरे फाटक से निकाला जाने लगा उसी समय एकाएक मेरे रूप-रंग में परिवर्तन हो गया। अब मैं ब्रह्मराक्षस की शक्ल में था। मुझे शेष आयु ब्रह्मराक्षस की योनि में भोगनी थी।
सरजू पाण्डेय की आत्मा अन्त में बोली–ब्रह्मराक्षस की योनि काफी कष्ट दायिनी होती है। भूख-प्यास लगने पर न तो कुछ खाया जा सकता है और न तो पानी ही पिया जा सकता है। जिस कारण मृत्यु हुई रहती है, उसी दुःख, क्लेश और पीड़ा को यातना के रूप में बराबर भोगना पड़ता है, बराबर अशान्ति की स्थिति बनी रहती है। मैं भी उसी यातना को भोग रहा हूँ और उसी अशान्ति की अवस्था में जी रहा हूँ। उस यातना और अशान्ति से तभी मुक्ति मिलेगी जब जिस समय मेरी आत्मा गर्भ में प्रवेश कर मालती के पुत्र के रूप में आपकी दुनियां में जन्म ले लेगी।
सरजू पाण्डेय की मृतात्मा की मृत्यु से पुनर्जन्म तक की यह अलौकिक कथा यहीं समाप्त हो जाती है। मगर मुझे ललिता की आत्मा के माध्यम से उन आत्माओं से भी साक्षात्कार करना था जिनकी खोपड़ियां मेरे पास सुरक्षित थीं।

समाप्त!!!

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