Advertisements

Category: chakra


आखिर क्यों करते हैं मंत्रोच्चार?
जानिये मंत्र विज्ञान के अध्यात्मिक व वैज्ञानिक फ़ायदे!!!
#proudtobehindu #wakeuphindus
#hinduismscientificallyprovedreligion
#powerofhinduism
#हिन्दुत्वकिमहानता
#हिन्दुत्वकिताक़त
#अपनेहिन्दूहोनेपरगर्वकरें
#जयतु_जयतु_हिन्दुराष्ट्रम्

शास्त्रकार कहते हैं-
‘मननात् त्रायते इति मंत्र:’
अर्थात मनन करने पर जो त्राण दे या रक्षा करे वही मंत्र है। धर्म, कर्म और मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रेरणा देने वाली शक्ति को मंत्र कहते हैं। तंत्रानुसार देवता के सूक्ष्म शरीर को या इष्टदेव की कृपा को मंत्र कहते हैं।
सही अर्थ में मंत्र जप का उद्देश्य अपने इष्ट को स्मरण करना है।

मंत्र शब्द संस्कृत भाषा से है। संस्कृत के आधार पर मंत्र शब्द का अर्थ सोचना, धारणा करना , समझना व् चाहना होता है। केवल हिन्दुओ में ही नहीं वरन बौध्द, जैन , सिक्ख आदि सभी धर्मों में मंत्र जप किया जाता है। मुस्लिम भाई भी तस्बियां घुमाते है।

हजारों वर्ष पूर्व मंत्र शक्ति के रहस्य को प्राचीनकाल में वैदिक ऋषियों ने ढूंढ निकाला था। उन्होंने उनकी शक्तियों को जानकर ही वेद मंत्रों की रचना की। वैदिक ऋषियों ने ब्रह्मांड की सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट ध्वनियों को सुना और समझा। इसे सुनकर ही उन्होंने मंत्रों की रचना की। उन्होंने जिन मंत्रों का उच्चारण किया, उन मंत्रों को बाद में संस्कृत की लिपि मिली और इस तरह संपूर्ण संस्कृत भाषा ही मंत्र बन गई। संस्कृत की वर्णमाला का निर्माण बहुत ही सूक्ष्म ध्वनियों को सुनकरकिया गया।

मंत्र को सदगुरू के माध्यम से ही ग्रहण करना उचित होता है| सदगुरू ही सही रास्ता दिखा सकते हैं, मंत्र का उच्चारण, जप संख्या, बारीकियां समझा सकते हैं, और साधना काल में विपरीत परिश्तिती आने पर साधक की रक्षा कर सकते हैं|

साधक की प्राथमिक अवशता में सफलता व् साधना की पूर्णता मात्र सदगुरू की शक्ति के माध्यम से ही प्राप्त होती है| यदि साधक द्वारा अनेक बार साधना करने पर भी सफलता प्राप्त न हो, तो सदगुरू विशेष शक्तिपात द्वारा उसे सफलता की मंजिल तक पहुंचा देते हैं|

इस प्रकार मंत्र जप के माध्यम से नर से नारायण बना जा सकता है, जीवन के दुखों को मिटाया जा सकता है तथा अदभुद आनन्द, असीम शान्ति व् पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि मंत्र जप का अर्थ मंत्र कुछ शब्दों को रतना है, अपितु मंत्र जप का अर्थ है – जीवन को पूर्ण बनाना|

मंत्र साधना भी कई प्रकार की होती है। मं‍त्र से किसी देवी या देवता को साधा जाता है और मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी साधा जाता है। ‘मंत्र’ का अर्थ है मन को एक तंत्र में लाना। मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है, तब वह सिद्ध होने लगता है। ‘मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है।

भगवन श्रीकृष्ण जी ने गीता के १० वें अध्याय के २५ वें श्लोक में ‘जपयज्ञ’ को अपनी विभूति बताया है। जपयज्ञ सब के लिए आसान है। इसमें कोई ज्यादा खर्च नही , कोई कठोर नियम नही। यह जब चाहो तब किया जा सकता है।

मंत्र के प्रकार
मंत्र 3 प्रकार के होते हैं : 1. स्त्रीलिंग, 2. पुल्लिंग और 3. नपुंसक लिंग।

1. स्त्रीलिंग : ‘स्वाहा’ से अंत होने वाले मंत्र स्त्रीलिंग हैं।
2. पुल्लिंग : ‘हूं फट्’ वाले पुल्लिंग हैं।
3. नपुंसक : ‘नमः’ अंत वाले नपुंसक हैं।

*मंत्रों के शास्त्रोक्त प्रकार : 1. वैदिक, 2. पौराणिक और 3. साबर।
*कुछ विद्वान इसके प्रकार अलग बताते हैं : 1. वैदिक, 2. तांत्रिक और 3. साबर।

*वैदिक मंत्र के प्रकार : 1. सात्विक और 2. तांत्रिक।
* वैदिक मंत्रों के जप के प्रकार : 1. वैखरी, 2. मध्यमा, 3. पश्यंती और 4. परा।

1. वैखरी : उच्च स्वर से जो जप किया जाता है, उसे वैखरी मंत्र जप कहते हैं।
2. मध्यमा : इसमें होंठ भी नहीं हिलते व दूसरा कोई व्यक्ति मंत्र को सुन भी नहीं सकता।
3. पश्यंती : जिस जप में जिह्वा भी नहीं हिलती, हृदयपूर्वक जप होता है और जप के अर्थ में हमारा चित्त तल्लीन होता जाता है, उसे पश्यंती मंत्र जाप कहते हैं।
4. परा : मंत्र के अर्थ में हमारी वृत्ति स्थिर होने की तैयारी हो, मंत्र जप करते-करते आनंद आने लगे तथा बुद्धि परमात्मा में स्थिर होने लगे, उसे परा मंत्र जप कहते हैं।

जप का प्रभाव : वैखरी से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव मध्यमा में होता है। मध्यमा से 10 गुना प्रभाव पश्यंती में तथा पश्यंती से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव परा में होता है। इस प्रकार परा में स्थित होकर जप करें तो वैखरी का हजार गुना प्रभाव हो जाएगा।

*पौराणिक मंत्र के प्रकार :
पौराणिक मंत्र जप के प्रकार : 1. वाचिक, 2. उपांशु और 3. मानसिक।

1. वाचिक : जिस मंत्र का जप करते समय दूसरा सुन ले, उसको वाचिक जप कहते हैं।
2. उपांशु : जो मंत्र हृदय में जपा जाता है, उसे उपांशु जप कहते हैं।
3. मानसिक : जिसका मौन रहकर जप करें, उसे मानसिक जप कहते हैं।

* वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ध्वनि तरंगें ऊर्जा का ही एक रूप हैं। मंत्र में निहित बीजाक्षरों में उच्चारित ध्वनियों से शक्तिशाली विद्युत तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो चमत्कारी प्रभाव डालती हैं।

* सकारात्मक ध्वनियां शरीर के तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं जबकि नकारात्मक ध्वनियां शरीर की ऊर्जा तक का ह्रास कर देती हैं। मंत्र और कुछ नहीं, बल्कि सकारात्मक ध्वनियों का समूह है, जो विभिन्न शब्दों के संयोग से पैदा होते हैं।

* मंत्रों की ध्वनि से हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों सकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं। स्थूल शरीर जहां स्वस्थ होने लगता हैं, वहीं जब सूक्ष्म शरीर प्रभावित होता है तो हम में या तो सिद्धियों का उद्भव होने लगता है या हमारा संबंध ईथर माध्यम से हो जाता है और इस तरह हमारे मन व मस्तिष्क से निकली इच्छाएं फलित होने लगती हैं।

* निश्चित क्रम में संग्रहीत विशेष वर्ण जिनका विशेष प्रकार से उच्चारण करने पर एक निश्चित अर्थ निकलता है। अंत: मंत्रों के उच्चारण में अधिक शुद्धता का ध्यान रखा जाता है। अशुद्ध उच्चारण से इसका दुष्प्रभाव भी हो सकता है।

* रामचरित मानस में मंत्र जप को भक्ति का 5वां प्रकार माना गया है। मंत्र जप से उत्पन्न शब्द शक्ति संकल्प बल तथा श्रद्धा बल से और अधिक शक्तिशाली होकर अंतरिक्ष में व्याप्त ईश्वरीय चेतना के संपर्क में आती है जिसके फलस्वरूप मंत्र का चमत्कारिक प्रभाव साधक को सिद्धियों के रूप में मिलता है।
श्रीरामचरित्र मानस में नवधा भक्ति का जिकर भी आता है। इसमें रामजी शबरी को कहते है की
‘मंत्र जप मम दृढ विस्वास ,
पंचम भक्ति सो वेद प्रकासा ‘
अर्थार्थ मंत्र जप और मुझमे पक्का विश्वास रखो।

* शाप और वरदान इसी मंत्र शक्ति और शब्द शक्ति के मिश्रित परिणाम हैं। साधक का मंत्र उच्चारण जितना अधिक स्पष्ट होगा, मंत्र बल उतना ही प्रचंड होता जाएगा।

* मंत्रों में अनेक प्रकार की शक्तियां निहित होती हैं जिसके प्रभाव से देवी-देवताओं की शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र एक ऐसा साधन है, जो मनुष्य की सोई हुई सुसुप्त शक्तियों को सक्रिय कर देता है।

केन्द्रो पर मंत्र प्रभाव
हमारे शरीर में ७ केंद्र होते है। उनमे से नीचे के में घृणा , ईर्ष्या, भय, स्पर्धा , काम आदि होते है। लेकिन मंत्र जप के प्रभाव से जपने वाले का भय निर्भयता में , घृणा प्रेम में और काम राम में बदल जाता है।

प्रथम केंद्र मूलाधार होता है।

दूसरा स्वाधिष्ठान केंद्र होता है इसमें चिंता निश्चिंता में बदलती है। तीसरा केंद्र मणिपुर है। जिससे रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है। क्षमा शक्ति विकसित होती है।

सात बार ओम या हरिओम मंत्र का गुंजन करने से मूलाधार केंद्र में स्पंदन होता है जिससे रोगो के कीटाणु नष्ट होते है। क्रोध के हमारी जीवनी शक्ति का नाश होता है। वैज्ञानिकों का कहना है की यदि एक घंटे तक क्रोध करनेवाले व्यक्ति के श्वासों के कण इकट्ठे करके अगर इंजेक्शन बनाया जाये तो उस इंजेक्शन से २० लोगो को मारा जा सकता है।

यदि एक घंटे के क्रोध से २० लोगो की मृत्यु हो सकती है तो एक घंटे के हरिनाम कीर्तन से असंख्यों लोगों को आनंद व् मन की शांति मिलती है। मंत्र शक्ति में आश्चर्य नही तो क्या है। मंत्रशक्ति के द्वारा ये सब संभव है।

मंत्र जप और स्वास्थ्य
लगातार मंत्र जप करने से उछ रक्तचाप, गलत धारणायें, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं| मंत्र जप का साइड इफेक्ट (Side Effect) यही है|
मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दिम करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है|
“क्लीं ह्रीं” इत्यादि बीजाक्षरों का एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर ह्रदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व् उनके विकार नष्ट होते हैं|

जप के लिये ब्रह्म मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय पूरा वातावरण शान्ति पूर्ण रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहर या शोर नहीं होता| कुछ विशिष्ट साधनाओं के लिये रात्रि का समय अत्यंत प्रभावी होता है| गुरु के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए| सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है|

अपूर्व आभा
मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे से एक अपूर्व आभा आ जाति है| आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वास्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगे, तो इसके परिणाम स्वरुप मुखमंडल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही|

जप माला
जप करने के लिए माला एक साधन है| शिव या काली के लिए रुद्राक्ष माला, हनुमान के लिए मूंगा माला, लक्ष्मी के लिए कमलगट्टे की माला, गुरु के लिए स्फटिक माला – इस प्रकार विभिन्न मंत्रो के लिए विभिन्न मालाओं का उपयोग करना पड़ता है|

मानव शरीर में हमेशा विद्युत् का संचार होता रहता है| यह विद्युत् हाथ की उँगलियों में तीव्र होता है| इन उँगलियों के बीच जब माला फेरी जाती है, तो लयात्मक मंत्र ध्वनि (Rythmic sound of the Hymn) तथा उँगलियों में माला का भ्रमण दोनों के समन्वय से नूतन ऊर्जा का प्रादुर्भाव होता है|

जप माला के स्पर्श (जप के समय में) से कई लाभ हैं –
* रुद्राक्ष से कई प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं|
* कमलगट्टे की माला से शीतलता एव अआनंद की प्राप्ति होती है|
* स्फटिक माला से मन को अपूर्व शान्ति मिलती है|

दिशा
दिशा को भी मंत्र जप में आत्याधिक महत्त्व दिया गया है| प्रत्येक दिशा में एक विशेष प्रकार की तरंगे (Vibrations) प्रवाहित होती रहती है| सही दिशा के चयन से शीघ्र ही सफलता प्राप्त होती है|

जप-तप
जप में तब पूर्णता आ जाती है, पराकाष्टा की स्थिति आ जाती है, उस ‘तप’ कहते हैं| जप में एक लय होता है| लय का सरथ है ध्वनि के खण्ड| दो ध्वनि खण्डों की बीच में निःशब्दता है| इस निःशब्दता पर मन केन्द्रित करने की जो कला है, उसे तप कहते हैं| जब साधक तप की श्तिति को प्राप्त करता है, तो उसके समक्ष सृष्टि के सारे रहस्य अपने आप अभिव्यक्त हो जाते हैं| तपस्या में परिणति प्राप्त करने पर धीरे-धीरे हृदयगत अव्यक्त नाद सुनाई देने लगता है, तब वह साधक उच्चकोटि का योगी बन जाता है| ऐसा साधक गृहस्थ भी हो सकता है और संन्यासी भी|

कर्म विध्वंस
मनुष्य को अपने जीवन में जो दुःख, कष्ट, दारिद्य, पीड़ा, समस्याएं आदि भोगनी पड़ती हैं, उसका कारण प्रारब्ध है| जप के माध्यम से प्रारब्ध को नष्ट किया जा सकता है और जीवन में सभी दुखों का नाश कर, इच्छाओं को पूर्ण किया जा सकता है, इष्ट देवी या देवता का दर्शन प्राप्त किया जा सकता है|

Rohitt Shah (Vastu Acharya – Numero Vastu Guru)
Mahavastu, Numerology, Bazi and Lal Kitab Consultant
Our Online presences and links to follow US

Blog/Occult Tips Site: http://www.iBlogsAbout.com
Numerology Site:
http://www.MasterNumerologist.in
Online Mystic Store: http://www.MantraTantraYantras.com
*Twitter:* @MahavastuExpert; @MantraTantraYantras
*eMail:* MysticValues@gmail.com
*Call/WhatsApp:*
+63562 05555/06666; +9049410786 OR +7776034447

Advertisements

जानिए आपका कौन सा चक्र बिगड़ा है और उसे कैसे ठीक करे: –

7-chakras-ida-pingala-20450616

(1) मूलाधार चक्र- गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला ‘आधार चक्र’ है।आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता,धन,समृधि ,आत्मबल,शारीरिक बल,रोजगार कर्मशीलता,घाटा,असफलता रक्त एवं हड्डी के रोग,कमर व पीठ में दर्द ,आत्महत्या के बिचार,डिप्रेशन,केंसर अ।दि होता है।

(2) स्वाधिष्ठान चक्र- इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है ।उसकी छ:पंखुरियाँ हैं।इसके बिगड़ने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता,बाँझपन ,मंद्बुधिता,मूत्राशय और गर्भाशय के रोग ,अध्यात्मिक सिद्धी में बाधा बैभव के आनंद में कमी अदि होता है।

(3) मणिपूर चक्र- नाभि में दस दल वाला मणिपूर चक्रहै। इसके इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता,गुस्सा,चिंचिरापन, नशाखोरी,तनाव ,शंकलुप्रबिती,कई तरह की बिमारिया,दवावो का काम न करना,अज्ञातभय,चहरेक।तेजगायब ,धोखाधड़ी,डिप्रेशन,उग्रता
हिंशा,दुश्मनी,अपयश,अपमान,आलोचना,बदले की भावना ,एसिडिटी ,ब्लडप्रेशर,शुगर,थाईरायेड,सिर एवं शारीर के दर्द,किडनी ,लीवर ,केलोस्ट्राल,खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।

(4) अनाहत चक्र- हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है। इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़-फोड़, कुतर्क, चिन्ता,नफरत ,प्रेम में असफलता ,प्यार में धोखा ,अकेलापन ,अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी ,मन में उदासी, जीवन में बिरानगी ,सबकुछ होते हुए भी बेचैनी ,छाती में दर्द ,साँस लेने में दिक्कत,सुख का अभाव,ह्रदय व फेफड़े के रोग,केलोस्ट्राल में बढ़ोतरी आदि।

(5) विशुद्ध चक्र –कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है।यह सोलह पंखुरियों वाला है।यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष,अभिब्यक्तिमें कमी,गले,नाक,कान,दात, थाईरायेड, आत्मजागरण में बाधा आती है।

(6) आज्ञा चक्र – भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इसके बिगड़ने पर एकाग्रता,जीने की चाह,निर्णय की सक्ति, मानसिक सक्ति,सफलता की राह में अडचने आदि इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा ।

(7) सहस्रार चक्र -सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है। शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव,भाग्य का साथ न देना अदि ।

उपाय

अभिमंत्रित 7 चक्र ब्रेसलेट धारण किजये।

चक्रो को सही करने के लिए चक्र के बीज मंत्र के जाप करे।

नीचे उपाय के पिक्चर्स ओर मंत्र का लिंक दिया गया है।
7 Chakra Bracelet। 7 चक्र ब्रेसलेट


Chakra Beej Mantra। चक्र बीज मंत्र:

7 Chakra IMage with Beej Mantra

7 Chakra Beej Mantras:

Chakra-beej-mantras-the-sounds-of-the-chakras

Chakra Chanting Video

वास्तु और 7 चक्

अगर घर मे वास्तु दोष रहेगा तो उसकी वजह से भी चक्ररा इम्बलनसे हो सकते है।

नंबर्स और चक्र

आपकी जन्म तारीख में मिसिंग नंबर्स का भी नेगेटिव प्रभाव चक्रो पे हो सकता है।

%d bloggers like this: