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आखिर क्यों करते हैं मंत्रोच्चार?
जानिये मंत्र विज्ञान के अध्यात्मिक व वैज्ञानिक फ़ायदे!!!
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शास्त्रकार कहते हैं-
‘मननात् त्रायते इति मंत्र:’
अर्थात मनन करने पर जो त्राण दे या रक्षा करे वही मंत्र है। धर्म, कर्म और मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रेरणा देने वाली शक्ति को मंत्र कहते हैं। तंत्रानुसार देवता के सूक्ष्म शरीर को या इष्टदेव की कृपा को मंत्र कहते हैं।
सही अर्थ में मंत्र जप का उद्देश्य अपने इष्ट को स्मरण करना है।

मंत्र शब्द संस्कृत भाषा से है। संस्कृत के आधार पर मंत्र शब्द का अर्थ सोचना, धारणा करना , समझना व् चाहना होता है। केवल हिन्दुओ में ही नहीं वरन बौध्द, जैन , सिक्ख आदि सभी धर्मों में मंत्र जप किया जाता है। मुस्लिम भाई भी तस्बियां घुमाते है।

हजारों वर्ष पूर्व मंत्र शक्ति के रहस्य को प्राचीनकाल में वैदिक ऋषियों ने ढूंढ निकाला था। उन्होंने उनकी शक्तियों को जानकर ही वेद मंत्रों की रचना की। वैदिक ऋषियों ने ब्रह्मांड की सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट ध्वनियों को सुना और समझा। इसे सुनकर ही उन्होंने मंत्रों की रचना की। उन्होंने जिन मंत्रों का उच्चारण किया, उन मंत्रों को बाद में संस्कृत की लिपि मिली और इस तरह संपूर्ण संस्कृत भाषा ही मंत्र बन गई। संस्कृत की वर्णमाला का निर्माण बहुत ही सूक्ष्म ध्वनियों को सुनकरकिया गया।

मंत्र को सदगुरू के माध्यम से ही ग्रहण करना उचित होता है| सदगुरू ही सही रास्ता दिखा सकते हैं, मंत्र का उच्चारण, जप संख्या, बारीकियां समझा सकते हैं, और साधना काल में विपरीत परिश्तिती आने पर साधक की रक्षा कर सकते हैं|

साधक की प्राथमिक अवशता में सफलता व् साधना की पूर्णता मात्र सदगुरू की शक्ति के माध्यम से ही प्राप्त होती है| यदि साधक द्वारा अनेक बार साधना करने पर भी सफलता प्राप्त न हो, तो सदगुरू विशेष शक्तिपात द्वारा उसे सफलता की मंजिल तक पहुंचा देते हैं|

इस प्रकार मंत्र जप के माध्यम से नर से नारायण बना जा सकता है, जीवन के दुखों को मिटाया जा सकता है तथा अदभुद आनन्द, असीम शान्ति व् पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि मंत्र जप का अर्थ मंत्र कुछ शब्दों को रतना है, अपितु मंत्र जप का अर्थ है – जीवन को पूर्ण बनाना|

मंत्र साधना भी कई प्रकार की होती है। मं‍त्र से किसी देवी या देवता को साधा जाता है और मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी साधा जाता है। ‘मंत्र’ का अर्थ है मन को एक तंत्र में लाना। मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है, तब वह सिद्ध होने लगता है। ‘मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है।

भगवन श्रीकृष्ण जी ने गीता के १० वें अध्याय के २५ वें श्लोक में ‘जपयज्ञ’ को अपनी विभूति बताया है। जपयज्ञ सब के लिए आसान है। इसमें कोई ज्यादा खर्च नही , कोई कठोर नियम नही। यह जब चाहो तब किया जा सकता है।

मंत्र के प्रकार
मंत्र 3 प्रकार के होते हैं : 1. स्त्रीलिंग, 2. पुल्लिंग और 3. नपुंसक लिंग।

1. स्त्रीलिंग : ‘स्वाहा’ से अंत होने वाले मंत्र स्त्रीलिंग हैं।
2. पुल्लिंग : ‘हूं फट्’ वाले पुल्लिंग हैं।
3. नपुंसक : ‘नमः’ अंत वाले नपुंसक हैं।

*मंत्रों के शास्त्रोक्त प्रकार : 1. वैदिक, 2. पौराणिक और 3. साबर।
*कुछ विद्वान इसके प्रकार अलग बताते हैं : 1. वैदिक, 2. तांत्रिक और 3. साबर।

*वैदिक मंत्र के प्रकार : 1. सात्विक और 2. तांत्रिक।
* वैदिक मंत्रों के जप के प्रकार : 1. वैखरी, 2. मध्यमा, 3. पश्यंती और 4. परा।

1. वैखरी : उच्च स्वर से जो जप किया जाता है, उसे वैखरी मंत्र जप कहते हैं।
2. मध्यमा : इसमें होंठ भी नहीं हिलते व दूसरा कोई व्यक्ति मंत्र को सुन भी नहीं सकता।
3. पश्यंती : जिस जप में जिह्वा भी नहीं हिलती, हृदयपूर्वक जप होता है और जप के अर्थ में हमारा चित्त तल्लीन होता जाता है, उसे पश्यंती मंत्र जाप कहते हैं।
4. परा : मंत्र के अर्थ में हमारी वृत्ति स्थिर होने की तैयारी हो, मंत्र जप करते-करते आनंद आने लगे तथा बुद्धि परमात्मा में स्थिर होने लगे, उसे परा मंत्र जप कहते हैं।

जप का प्रभाव : वैखरी से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव मध्यमा में होता है। मध्यमा से 10 गुना प्रभाव पश्यंती में तथा पश्यंती से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव परा में होता है। इस प्रकार परा में स्थित होकर जप करें तो वैखरी का हजार गुना प्रभाव हो जाएगा।

*पौराणिक मंत्र के प्रकार :
पौराणिक मंत्र जप के प्रकार : 1. वाचिक, 2. उपांशु और 3. मानसिक।

1. वाचिक : जिस मंत्र का जप करते समय दूसरा सुन ले, उसको वाचिक जप कहते हैं।
2. उपांशु : जो मंत्र हृदय में जपा जाता है, उसे उपांशु जप कहते हैं।
3. मानसिक : जिसका मौन रहकर जप करें, उसे मानसिक जप कहते हैं।

* वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ध्वनि तरंगें ऊर्जा का ही एक रूप हैं। मंत्र में निहित बीजाक्षरों में उच्चारित ध्वनियों से शक्तिशाली विद्युत तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो चमत्कारी प्रभाव डालती हैं।

* सकारात्मक ध्वनियां शरीर के तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं जबकि नकारात्मक ध्वनियां शरीर की ऊर्जा तक का ह्रास कर देती हैं। मंत्र और कुछ नहीं, बल्कि सकारात्मक ध्वनियों का समूह है, जो विभिन्न शब्दों के संयोग से पैदा होते हैं।

* मंत्रों की ध्वनि से हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों सकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं। स्थूल शरीर जहां स्वस्थ होने लगता हैं, वहीं जब सूक्ष्म शरीर प्रभावित होता है तो हम में या तो सिद्धियों का उद्भव होने लगता है या हमारा संबंध ईथर माध्यम से हो जाता है और इस तरह हमारे मन व मस्तिष्क से निकली इच्छाएं फलित होने लगती हैं।

* निश्चित क्रम में संग्रहीत विशेष वर्ण जिनका विशेष प्रकार से उच्चारण करने पर एक निश्चित अर्थ निकलता है। अंत: मंत्रों के उच्चारण में अधिक शुद्धता का ध्यान रखा जाता है। अशुद्ध उच्चारण से इसका दुष्प्रभाव भी हो सकता है।

* रामचरित मानस में मंत्र जप को भक्ति का 5वां प्रकार माना गया है। मंत्र जप से उत्पन्न शब्द शक्ति संकल्प बल तथा श्रद्धा बल से और अधिक शक्तिशाली होकर अंतरिक्ष में व्याप्त ईश्वरीय चेतना के संपर्क में आती है जिसके फलस्वरूप मंत्र का चमत्कारिक प्रभाव साधक को सिद्धियों के रूप में मिलता है।
श्रीरामचरित्र मानस में नवधा भक्ति का जिकर भी आता है। इसमें रामजी शबरी को कहते है की
‘मंत्र जप मम दृढ विस्वास ,
पंचम भक्ति सो वेद प्रकासा ‘
अर्थार्थ मंत्र जप और मुझमे पक्का विश्वास रखो।

* शाप और वरदान इसी मंत्र शक्ति और शब्द शक्ति के मिश्रित परिणाम हैं। साधक का मंत्र उच्चारण जितना अधिक स्पष्ट होगा, मंत्र बल उतना ही प्रचंड होता जाएगा।

* मंत्रों में अनेक प्रकार की शक्तियां निहित होती हैं जिसके प्रभाव से देवी-देवताओं की शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र एक ऐसा साधन है, जो मनुष्य की सोई हुई सुसुप्त शक्तियों को सक्रिय कर देता है।

केन्द्रो पर मंत्र प्रभाव
हमारे शरीर में ७ केंद्र होते है। उनमे से नीचे के में घृणा , ईर्ष्या, भय, स्पर्धा , काम आदि होते है। लेकिन मंत्र जप के प्रभाव से जपने वाले का भय निर्भयता में , घृणा प्रेम में और काम राम में बदल जाता है।

प्रथम केंद्र मूलाधार होता है।

दूसरा स्वाधिष्ठान केंद्र होता है इसमें चिंता निश्चिंता में बदलती है। तीसरा केंद्र मणिपुर है। जिससे रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है। क्षमा शक्ति विकसित होती है।

सात बार ओम या हरिओम मंत्र का गुंजन करने से मूलाधार केंद्र में स्पंदन होता है जिससे रोगो के कीटाणु नष्ट होते है। क्रोध के हमारी जीवनी शक्ति का नाश होता है। वैज्ञानिकों का कहना है की यदि एक घंटे तक क्रोध करनेवाले व्यक्ति के श्वासों के कण इकट्ठे करके अगर इंजेक्शन बनाया जाये तो उस इंजेक्शन से २० लोगो को मारा जा सकता है।

यदि एक घंटे के क्रोध से २० लोगो की मृत्यु हो सकती है तो एक घंटे के हरिनाम कीर्तन से असंख्यों लोगों को आनंद व् मन की शांति मिलती है। मंत्र शक्ति में आश्चर्य नही तो क्या है। मंत्रशक्ति के द्वारा ये सब संभव है।

मंत्र जप और स्वास्थ्य
लगातार मंत्र जप करने से उछ रक्तचाप, गलत धारणायें, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं| मंत्र जप का साइड इफेक्ट (Side Effect) यही है|
मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दिम करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है|
“क्लीं ह्रीं” इत्यादि बीजाक्षरों का एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर ह्रदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व् उनके विकार नष्ट होते हैं|

जप के लिये ब्रह्म मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय पूरा वातावरण शान्ति पूर्ण रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहर या शोर नहीं होता| कुछ विशिष्ट साधनाओं के लिये रात्रि का समय अत्यंत प्रभावी होता है| गुरु के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए| सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है|

अपूर्व आभा
मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे से एक अपूर्व आभा आ जाति है| आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वास्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगे, तो इसके परिणाम स्वरुप मुखमंडल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही|

जप माला
जप करने के लिए माला एक साधन है| शिव या काली के लिए रुद्राक्ष माला, हनुमान के लिए मूंगा माला, लक्ष्मी के लिए कमलगट्टे की माला, गुरु के लिए स्फटिक माला – इस प्रकार विभिन्न मंत्रो के लिए विभिन्न मालाओं का उपयोग करना पड़ता है|

मानव शरीर में हमेशा विद्युत् का संचार होता रहता है| यह विद्युत् हाथ की उँगलियों में तीव्र होता है| इन उँगलियों के बीच जब माला फेरी जाती है, तो लयात्मक मंत्र ध्वनि (Rythmic sound of the Hymn) तथा उँगलियों में माला का भ्रमण दोनों के समन्वय से नूतन ऊर्जा का प्रादुर्भाव होता है|

जप माला के स्पर्श (जप के समय में) से कई लाभ हैं –
* रुद्राक्ष से कई प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं|
* कमलगट्टे की माला से शीतलता एव अआनंद की प्राप्ति होती है|
* स्फटिक माला से मन को अपूर्व शान्ति मिलती है|

दिशा
दिशा को भी मंत्र जप में आत्याधिक महत्त्व दिया गया है| प्रत्येक दिशा में एक विशेष प्रकार की तरंगे (Vibrations) प्रवाहित होती रहती है| सही दिशा के चयन से शीघ्र ही सफलता प्राप्त होती है|

जप-तप
जप में तब पूर्णता आ जाती है, पराकाष्टा की स्थिति आ जाती है, उस ‘तप’ कहते हैं| जप में एक लय होता है| लय का सरथ है ध्वनि के खण्ड| दो ध्वनि खण्डों की बीच में निःशब्दता है| इस निःशब्दता पर मन केन्द्रित करने की जो कला है, उसे तप कहते हैं| जब साधक तप की श्तिति को प्राप्त करता है, तो उसके समक्ष सृष्टि के सारे रहस्य अपने आप अभिव्यक्त हो जाते हैं| तपस्या में परिणति प्राप्त करने पर धीरे-धीरे हृदयगत अव्यक्त नाद सुनाई देने लगता है, तब वह साधक उच्चकोटि का योगी बन जाता है| ऐसा साधक गृहस्थ भी हो सकता है और संन्यासी भी|

कर्म विध्वंस
मनुष्य को अपने जीवन में जो दुःख, कष्ट, दारिद्य, पीड़ा, समस्याएं आदि भोगनी पड़ती हैं, उसका कारण प्रारब्ध है| जप के माध्यम से प्रारब्ध को नष्ट किया जा सकता है और जीवन में सभी दुखों का नाश कर, इच्छाओं को पूर्ण किया जा सकता है, इष्ट देवी या देवता का दर्शन प्राप्त किया जा सकता है|

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ग्रह दोष के पूर्व संकेत
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ग्रह अपना शुभाशुभ प्रभाव गोचर एवं दशा-अन्तर्दशा-प्रत्यन्तर्दशा में देते हैं।जिस ग्रह की दशा के प्रभाव में हम होते हैं, उसकी स्थिति के अनुसार शुभाशुभ फल हमें मिलता है ।जब भी कोई ग्रह अपना शुभ या अशुभ फल प्रबल रुप में देने वाला होता है, तो वह कुछ संकेत पहले से ही देने लगता है । ऐसे ही कुछ पूर्व संकेतों का विवरण यहाँ दृष्टव्य है।

सूर्य के अशुभ होने के पूर्व संकेत
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👉 सूर्य अशुभ फल देने वाला हो, तो घर में रोशनी देने वाली वस्तुएँ नष्ट होंगी या प्रकाश का स्रोत बंद होगा । जैसे – जलते हुए बल्ब का फ्यूज होना, तांबे की वस्तु खोना ।
👉 किसी ऐसे स्थान पर स्थित रोशनदान का बन्द होना, जिससे सूर्योदय से दोपहर तक सूर्य का प्रकाश प्रवेश करता हो । ऐसे रोशनदान के बन्द होने के अनेक कारण हो सकते हैं । जैसे – अनजाने में उसमें कोई सामान भर देना या किसी पक्षी के घोंसला बना लेने के कारण उसका बन्द हो जाना आदि ।
👉 सूर्य के कारकत्व से जुड़े विषयों के बारे में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है । सूर्य जन्म-कुण्डली में जिस भाव में होता है, उस भाव से जुड़े फलों की हानि करता है । यदि सूर्य पंचमेश, नवमेश हो तो पुत्र एवं पिता को कष्ट देता है । सूर्य लग्नेश हो,तो जातक को सिरदर्द, ज्वर एवं पित्त रोगों से पीड़ा मिलती है । मान-प्रतिष्ठा की हानि का सामना करना पड़ता है ।
👉 किसी अधिकारी वर्ग से तनाव, राज्य-पक्ष से परेशानी ।
👉 यदि न्यायालय में विवाद चल रहा हो, तो प्रतिकूल परिणाम ।
👉 शरीर के जोड़ों में अकड़न तथा दर्द ।
👉 किसी कारण से फसल का सूख जाना ।
👉 व्यक्ति के मुँह में अक्सर थूक आने लगता है तथा उसे बार-बार थूकना पड़ता है ।
👉 सिर किसी वस्तु से टकरा जाता है ।
👉 तेज धूप में चलना या खड़े रहना पड़ता है

चन्द्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत
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👉 जातक की कोई चाँदी की अंगुठी या अन्य आभूषण खो जाता है या जातक मोती पहने हो, तो खो जाता है।
👉 जातक के पास एकदम सफेद तथा सुन्दर वस्त्र हो वह अचानक फट जाता है या खो जाता है या उस पर कोई गहरा धब्बा लगने से उसकी शोभा चली जाती है।
👉 व्यक्ति के घर में पानी की टंकी लीक होने लगती है या नल आदि जल स्रोत के खराब होने पर वहाँ से पानी व्यर्थ बहने लगता है । पानी का घड़ा अचानक टूट जाता है ।
👉 घर में कहीं न कहीं व्यर्थ जल एकत्रित हो जाता है तथा दुर्गन्ध देने लगता है ।

उक्त संकेतों से निम्नलिखित विषयों में अशुभ फल दे सकते हैं ।
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👉 माता को शारीरिक कष्ट हो सकता है या अन्य किसी प्रकार से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है ।
👉 नवजात कन्या संतान को किसी प्रकार से पीड़ा हो सकती है ।
👉 मानसिक रुप से जातक बहुत परेशानी का अनुभव करता है ।
👉 किसी महिला से वाद-विवाद हो सकता है ।
👉 जल से जुड़े रोग एवं कफ रोगों से पीड़ा हो सकती है । जैसे – जलोदर, जुकाम, खाँसी, नजला, हेजा आदि ।
👉 प्रेम-प्रसंग में भावनात्मक आघात लगता है ।
👉 समाज में अपयश का सामना करना पड़ता है । मन में बहुत अशान्ति होती है ।
👉 घर का पालतु पशु मर सकता है ।
👉 घर में सफेद रंग वाली खाने-पीने की वस्तुओं की कमी हो जाती है या उनका नुकसान होता है । जैसे– दूध का उफन जाना ।
👉 मानसिक रुप से असामान्य स्थिति हो जाती है

मंगल के अशुभ होने के पूर्व संकेत
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👉 भूमि का कोई भाग या सम्पत्ति का कोई भाग टूट-फूट जाता है ।
👉 घर के किसी कोने में या स्थान में आग लग जाती है ।यह छोटे स्तर पर ही होती है ।
👉 किसी लाल रंग की वस्तु या अन्य किसी प्रकार से मंगल के कारकत्त्व वाली वस्तु खो जाती है या नष्ट हो जाती है।
👉 घर के किसी भाग का या ईंट का टूट जाना ।
👉 हवन की अग्नि का अचानक बन्द हो जाना ।
👉 अग्नि जलाने के अनेक प्रयास करने पर भी अग्नि का प्रज्वलित न होना या अचानक जलती हुई अग्नि का बन्द हो जाना ।
👉 वात-जन्य विकार अकारण ही शरीर में प्रकट होने लगना ।
👉 किसी प्रकार से छोटी-मोटी दुर्घटना हो सकती है ।

बुध के अशुभ होने के पूर्व संकेत
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👉 व्यक्ति की विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है अर्थात् वह अच्छे-बुरे का निर्णय करने में असमर्थ रहता है ।
👉 सूँघने की शक्ति कम हो जाती है ।
👉काम-भावना कम हो जाती है । त्वचा के संक्रमण रोग उत्पन्न होते हैं । पुस्तकें, परीक्षा ले कारण धन का अपव्यय होता है । शिक्षा में शिथिलता आती है ।

गुरु के अशुभ होने के पूर्व संकेत
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👉 अच्छे कार्य के बाद भी अपयश मिलता है ।
👉 किसी भी प्रकार का आभूषण खो जाता है ।
👉 व्यक्ति के द्वारा पूज्य व्यक्ति या धार्मिक क्रियाओं का अनजाने में ही अपमान हो जाता है या कोई धर्म ग्रन्थ नष्ट होता है ।
👉 सिर के बाल कम होने लगते हैं अर्थात् व्यक्ति गंजा होने लगता है ।
👉 दिया हुआ वचन पूरा नहीं होता है तथा असत्य बोलना पड़ता है ।

शुक्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत
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👉 किसी प्रकार के त्वचा सम्बन्धी रोग जैसे – दाद,खुजली आदि उत्पन्न होते हैं ।
👉 स्वप्नदोष, धातुक्षीणता आदि रोग प्रकट होने लगते हैं ।
👉 कामुक विचार हो जाते हैं ।
👉 किसी महिला से विवाद होता है ।
👉 हाथ या पैर का अंगुठा सुन्न या निष्क्रिय होने लगता है ।

शनि के अशुभ होने के पूर्व संकेत
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👉 दिन में नींद सताने लगती है ।
👉 अकस्मात् ही किसी अपाहिज या अत्यन्त निर्धन और गन्दे व्यक्ति से वाद-विवाद हो जाता है ।
👉 मकान का कोई हिस्सा गिर जाता है ।
👉 लोहे से चोट आदि का आघात लगता है ।
👉 पालतू काला जानवर जैसे- काला कुत्ता, काली गाय, काली भैंस, काली बकरी या काला मुर्गा आदि मर जाता है ।
👉 निम्न-स्तरीय कार्य करने वाले व्यक्ति से झगड़ा या तनाव होता है ।
👉 व्यक्ति के हाथ से तेल फैल जाता है ।
👉 व्यक्ति के दाढ़ी-मूँछ एवं बाल बड़े हो जाते हैं ।
👉 कपड़ों पर कोई गन्दा पदार्थ गिरता है या धब्बा लगता है या साफ-सुथरे कपड़े पहनने की जगह गन्दे वस्त्र पहनने की स्थिति बनती है ।
👉 अँधेरे, गन्दे एवं घुटन भरी जगह में जाने का अवसर मिलता है ।

राहु के अशुभ होने के पूर्व संकेत
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👉 मरा हुआ सर्प या छिपकली दिखाई देती है ।
👉 धुएँ में जाने या उससे गुजरने का अवसर मिलता है या व्यक्ति के पास ऐसे अनेक लोग एकत्रित हो जाते हैं, जो कि निरन्तर धूम्रपान करते हैं ।
👉 किसी नदी या पवित्र कुण्ड के समीप जाकर भी व्यक्ति स्नान नहीं करता ।
👉 पाला हुआ जानवर खो जाता है या मर जाता है ।
👉 याददाश्त कमजोर होने लगती है ।
👉 अकारण ही अनेक व्यक्ति आपके विरोध में खड़े होने लगते हैं ।
👉 हाथ के नाखुन विकृत होने लगते हैं ।
👉 मरे हुए पक्षी देखने को मिलते हैं ।
👉 बँधी हुई रस्सी टूट जाती है । मार्ग भटकने की स्थिति भी सामने आती है । व्यक्ति से कोई आवश्यक चीज खो जाती है ।

केतु के अशुभ होने के पूर्व संकेत
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👉 मुँह से अनायास ही अपशब्द निकल जाते हैं ।
👉 कोई मरणासन्न या पागल कुत्ता दिखायी देता है।
👉 घर में आकर कोई पक्षी प्राण-त्याग देता है ।
👉 अचानक अच्छी या बुरी खबरें सुनने को मिलती है ।
👉 हड्डियों से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।
👉 पैर का नाखून टूटता या खराब होने लगता है ।
👉 किसी स्थान पर गिरने एवं फिसलने की स्थिति बनती है ।
👉 भ्रम होने के कारण व्यक्ति से हास्यास्पद गलतियाँ होती।

Rohitt Shah (B. Eng., CSM)

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