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Category: Mantra Tantra Yantra


This article highlights important Zones/Directions that ensures success in Life. Follow the suggested tip and have great success in life!

Alakh Niranjan !!!!

VASTU TIP- Success in Life By Mystic Solutions

 

Rohitt Shah (Vastu Acharya – Numero Vastu Guru)

Vastu Acharya, Master Numerologist, Bazi and Lal Kitab Consultant

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NOTE: One need to ensure that they locate the direction accurately for tips to work. We work on 16 zones (directions) so make sure you plot the direction accurately.

16 Zones (directions): NorthNorth of NE, North-East(NE)East of NE EastEast of SESouth-East (SE)South of SESouthSouth of SWSouth-West (SW)West of SWWestWest of NWNorth-West (NW)North of NW.

Each zone carries its own attributes, colours, patterns and associations with 5 elements (Water, wood, Fire, Earth and Space).

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Numerology Tips:

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*ऊँ श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर कुछ विशेष वास्तु अर्पित की जाती है जिसे शिवामुट्ठी कहते है।*

1. प्रथम सोमवार को कच्चे चावल एक मुट्ठी,

2. दूसरे सोमवार को सफेद तिल् एक मुट्ठी,

3. तीसरे सोमवार को खड़े मूँग एक मुट्ठी,

4. चौथे सोमवार को जौ एक मुट्ठी और

5. यदि जिस मॉस में पांच सोमवार हो तो पांचवें सोमवार को सतुआ चढ़ाने जाते हैं।

यदि पांच सोमवार न हो तो आखरी सोमवार को दो मुट्ठी भोग अर्पित करते है।

माना जाता है कि श्रावण मास में शिव की पूजा करने से सारे कष्ट खत्म हो जाते हैं। महादेव शिव सर्व समर्थ हैं। वे मनुष्य के समस्त पापों का क्षय करके मुक्ति दिलाते हैं। इनकी पूजा से ग्रह बाधा भी दूर होती है।

1. *सूर्य* से संबंधित बाधा है, तो विधिवत या पंचोपचार के बाद लाल { बैगनी } आक के पुष्प एवं पत्तों से शिव की पूजा करनी चाहिए।

2. *चंद्रमा* से परेशान हैं, तो प्रत्येक सोमवार शिवलिंग पर गाय का दूध अर्पित करें। साथ ही सोमवार का व्रत भी करें।

3. *मंगल* से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गिलोय की जड़ी-बूटी के रस से शिव का अभिषेक करना लाभप्रद रहेगा।

4. *बुध* से संबंधित परेशानी दूर करने के लिए विधारा की जड़ी के रस से शिव का अभिषेक करना ठीक रहेगा।

5. *बृहस्पति* से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए प्रत्येक बृहस्पतिवार को हल्दी मिश्रित दूध शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।

6. *शुक्र* ग्रह को अनुकूल बनाना चाहते हैं, तो पंचामृत एवं घृत से शिवलिंग का अभिषेक करें।

7. *शनि* से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गन्ने के रस एवं छाछ से शिवलिंग का अभिषेक करें।

8 . *राहु-केतु* से मुक्ति के लिए कुश और दूर्वा को जल में मिलाकर शिव का अभिषेक करने से लाभ होगा।

शास्त्रों में मनोरथ पूर्ति व संकट मुक्ति के लिए अलग-अलग तरह की धारा से शिव का अभिषेक करना शुभ बताया गया है।

अलग-अलग धाराओं से शिव अभिषेक का फल- जब किसी का मन बेचैन हो, निराशा से भरा हो, परिवार में कलह हो रहा हो, अनचाहे दु:ख और कष्ट मिल रहे हो तब शिव लिंग पर दूध की धारा चढ़ाना सबसे अच्छा उपाय है।

*इसमें भी शिव मंत्रों का उच्चारण करते रहना चाहिए।*

1. *वंश की वृद्धि के लिए* शिवलिंग पर शिव सहस्त्रनाम बोलकर घी की धारा अर्पित करें।

2. शिव पर जलधारा से अभिषेक *मन की शांति के लिए* श्रेष्ठ मानी गई है।

3. *भौतिक सुखों को पाने के लिए* इत्र की धारा से शिवलिंग का अभिषेक करें।

4. *बीमारियों से छुटकारे के लिए* शहद की धारा से शिव पूजा करें।

5. गन्ने के रस की धारा से अभिषेक करने पर हर *सुख और आनंद मिलता है*।

6. सभी धाराओं से श्रेष्ठ है गंगाजल की धारा। शिव को गंगाधर कहा जाता है। शिव को गंगा की धार बहुत प्रिय है। गंगा जल से शिव अभिषेक करने पर *चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है।* इससे अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मन्त्र जरुर बोलना चाहिए।

कार्य सिद्धि के लिए:–

1. हर ‍इच्छा पूर्ति के लिए हैं अलग शिवलिंग
पार्थिव शिवलिंग हर कार्य सिद्धि के लिए।

2. गुड़ के शिवलिंग प्रेम पाने के लिए।

3. भस्म से बने शिवलिंग सर्वसुख की प्राप्ति के लिए।

4. जौ या चावल या आटे के शिवलिंग दाम्पत्य सुख, संतान प्राप्ति के लिए।

5. दही से बने शिवलिंग ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए।

6. पीतल, कांसी के शिवलिंग मोक्ष प्राप्ति के लिए।

7. सीसा इत्यादि के शिवलिंग शत्रु संहार के लिए।

8. पारे के शिवलिंग अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के लिए।

पूजन में रखे इन बातों का ध्यान:–

1. सावन के महीने में शिवलिंग की करें | शिवलिंग जहां स्थापित हो पूरव् दिशा की ओर मुख करके ही बैठें।

2. शिवलिंग के दक्षिण दिशा में बैठकर पूजन न करें।

ये होता है अभिषेक का फल:–

1. दूध से अभिषेक करने पर परिवार में कलह, मानसिक पीड़ा में शांति मिलती है।

2. घी से अभिषेक करने पर वंशवृद्धि होती है।

3. इत्र से अभिषेक करने पर भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।

4. जलधारा से अभिषेक करने पर मानसिक शान्ति मिलती है।

5. शहद से अभिषेक करने पर परिवार में बीमारियों का अधिक प्रकोप नहीं रहता।

6. गन्ने के रस की धारा डालते हुये अभिषेक करने से आर्थिक समृद्धि व परिवार में सुखद माहौल बना रहता है।

7. गंगा जल से अभिषेक करने पर चारो पुरूषार्थ की प्राप्ति होती है।

8. अभिषेक करते समय महामृत्युंजय का जाप करने से फल की प्राप्ति कई गुना अधिक हो जाती है।

9. सरसों के तेल से अभिषेक करने से शत्रुओं का शमन होता।

ये भी मिलते हैं फल:–

9. बिल्वपत्र चढ़ाने से जन्मान्तर के पापों व रोग से मुक्ति मिलती है।

10. कमल पुष्प चढ़ाने से शान्ति व धन की प्राप्ति होती है।

11. कुशा चढ़ाने से मुक्ति की प्राप्ति होती है।

12. दूर्वा चढ़ाने से आयु में वृद्धि होती है।

13. धतूरा अर्पित करने से पुत्र रत्न की प्राप्ति व पुत्र का सुख मिलता है।

14. कनेर का पुष्प चढ़ाने से परिवार में कलह व रोग से निवृत्ति मिलती हैं।

15. शमी पत्र चढ़ाने से पापों का नाश होता, शत्रुओं का शमन व भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है।

हर हर महादेव !!!

!जय माता दी!

By Acharya Vijay Shankari:

*———–:मृतात्माओं से संपर्क:————-*
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*भाग–1 व 2*
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्मज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरूदेव व गुरु माँ का कोटि कोटि वन्दन

(पारलौकिक जगत का अस्तित्व है–इसमें सन्देह नहीं। भूत-प्रेत जैसी अशरीरी आत्माओं का अस्तित्व है–इसमें भी सन्देह नहीं। इन सबके सम्बन्ध में जो कुछ देखा है, अनुभव किया है, उन्हींको अपनी भाषा में लिपिबद्ध कर प्रस्तुत कर रहा हूँ—
——परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव श्री।)

परामनोविज्ञान से एम्. ए. करने के बाद मन में आत्माओं के सम्बन्ध में जिज्ञासाओं का उत्पन्न होना स्वाभाविक था। उस समय प्रेतविद्या अथवा आत्म विद्या पर शोध करने की व्यवस्था विश्व विद्यालयों में नहीं थी। अतः मैंने व्यक्तिगत रूप से इस विषय पर खोज करने का निश्चय कर लिया। सबसे पहले मैंने इन दोनों विषयों से सम्बंधित तमाम पुस्तकों तथा हस्त लिखित ग्रन्थों का संग्रह किया। ऐसी पुस्तकों का जो संग्रह मेरे पास है, वैसा शायद ही किसीके पास हो। खोज के सिलसिले में मैंने यह जाना कि आत्माओं के कई भेद हैं, जिनमें जीवात्मा, मृतात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा–ये चार मुख्य हैं।
मृत्यु के बाद मनुष्य कहाँ जाता है और उसकी आत्मा किस अवस्था में रहती है ?–इस विषय में मुझे बचपन से कौतूहल रहा है। सच तो यह है कि मृत्यु के विषय में भय और शोक की भावना से कहीं अधिक जिज्ञासा का भाव मेरे मन में रहा है। शायद इसी कारण मैंने परामनोविज्ञान में एम्. ए. किया और शोध शुरू किया।
वास्तव में मृत्यु जीवन का अन्त नहीं। मृत्यु के बाद भी जीवन है। जैसे दिनभर के श्रम के बाद नींद आवश्यक है, उसी प्रकार जीवनभर के परिश्रम और भाग-दौड़ के बाद मृत्यु आवश्यक है। मृत्यु जीवनभर की थकान के बाद हमें विश्राम और शान्ति प्रदान करती है जिसके फल स्वरुप हम पुनः तरोताजा होकर नया जीवन शुरू करते हैं।
मेरी दृष्टि में मृत्यु का अर्थ है–गहरी नींद जिससे जागने पर हम नया जीवन, नया वातावरण और नया परिवार पाते हैं, फिर हमारी नयी यात्रा शुरू होती है। स्वर्ग-
नर्क केवल कल्पना मात्र है। शास्त्रों में इनकी कल्पना इसलिए की गयी है कि लोग पाप से बचें और सत् कार्य की ओर प्रवृत्त हों। नर्क का भय उन्हें दुष्कार्य से बचाएगा और स्वर्ग सुख की लालसा उन्हें पुण्य कार्य या सत् कार्य की ओर प्रेरित करेगी। जो कुछ भी हैं–वे हमारे विचार हैं, हमारी भावनाएं हैं जिनके ही अनुसार मृत्यु उपरांत हमारे लिए वातावरण तैयार होता है।
मृत्यु एक मंगलकारी क्षण है, एक सुखद और आनंदमय अनुभव है। मगर हम उसे अपने कुसंस्कार, वासना, लोभ-लालच आदि के कारण दारुण और कष्टमय बना लेते हैं। इन्ही सबका संस्कार हमारी आत्मा पर पड़ता रहता है जिससे हम मृत्यु के अज्ञात भय से त्रस्त रहते हैं।
मृत्यु के समय एक नीरव विस्फोट के साथ स्थूल शरीर के परमाणुओं का विघटन शुरू हो जाता है और शरीर को जला देने या ज़मीन में गाड़ देने के बाद भी ये परमाणु वातावरण में बिखरे रहते हैं। लेकिन उनमें फिर से उसी आकृति में एकत्र होने की प्रवृत्ति तीव्र रहती है। साथ ही इनमें मनुष्य की अतृप्त भोग-वासनाओं की लालसा भी बनी रहती है। इसी स्थिति को ‘प्रेतात्मा’ कहते हैं। प्रेतात्मा का शरीर आकाशीय वासनामय होता है। मृत्यु के बाद और प्रेतात्मा के बनने की पूर्व की अल्प अवधि की अवस्था को ‘मृतात्मा’ कहते हैं। मृतात्मा और प्रेतात्मा में बस थोड़ा-सा ही अन्तर है। वासना और कामना अच्छी-बुरी दोनों प्रकार की होती हैं। स्थूल शरीर को छोड़कर जितने भी शरीर हैं, सब भोग शरीर हैं। मृत आत्माओं के भी शरीर भोग शरीर हैं। वे अपनी वासनाओं-कामनाओं की पूर्ति के लिए जीवित व्यक्ति का सहारा लेती हैं। मगर उन्हीं व्यक्तियों का जिनका हृदय दुर्बल और जिनके विचार, भाव, संस्कार आदि उनसे मिलते-जुलते हैं।
मृतात्माओं का शरीर आकाशीय होने के कारण उनकी गति प्रकाश की गति के समान होती है। वे एक क्षण में हज़ारों मील की दूरी तय कर लेती हैं।

भाग–2
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जीवित व्यक्तियों के शरीर में मृतात्माएँ या प्रेतात्माएँ कैसे प्रवेश करती हैं ?

मृतात्माएँ अपने संस्कार और अपनी वासनाओं को जिस व्यक्ति में पाती हैं, उसीके माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर अपनी कामना पूर्ति कर लिया करती हैं। उदहारण के लिए–जैसे किसी व्यक्ति को पढ़ने-लिखने का शौक अधिक है, वह उसका संस्कार बन गया। उसमें पढ़ना-लिखना उसकी वासना कहलायेगी। जब कभी वह अपने संस्कार या अपनी वासना के अनुसार पढ़ने-लिखने बैठेगा, उस समय कोई मृतात्मा जिसकी भी वही वासना रही है, तत्काल उस व्यक्ति की ओर आकर्षित होगी और वासना और संस्कार के ही माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर अपनी वासना की पूर्ति कर लेगी। दूसरी ओर उस व्यक्ति की हालत यह होगी कि वह उस समय का पढ़ा-लिखा भूल जायेगा। किसी भी प्रकार का उसमें अपना संस्कार न बन पायेगा।
इसी प्रकार अन्य वासना, कामना और संस्कार के विषय में भी समझना चाहिए। हमारी जिस वासना को मृतात्माएँ भोगती हैं, उसका परिणाम हमारे लिए कुछ भी नहीं होता। इसके विपरीत, कुछ समय के लिए उस वासना के प्रति हमारे मन में अरुचि पैदा हो जाती है।
प्रेतात्माओं के अपने अलग ढंग हैं। वे जिस व्यक्ति को अपनी वासना-कामना अथवा अपने संस्कार के अनुकूल देखती हैं, तुरन्त सूक्ष्मतम प्राणवायु अर्थात्-ईथर के माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और अपनी वासना को संतुष्ट करने लग जाती हैं। इसीको ‘प्रेतबाधा’ कहते हैं। ऐसे व्यक्ति की बाह्य चेतना को प्रेतात्माएँ लुप्त कर उसकी अंतर्चेतना को प्रभावित कर अपनी इच्छानुसार उस व्यक्ति से काम करवाती हैं। इनके कार्य, विचार, भाव उसी व्यक्ति जैसे होते हैं जिस पर वह आरूढ़ होती है।
कहने की आवश्यकता नहीं, इस विषय में पाश्चात्य देशों में अनेक अनुसन्धान हो रहे हैं। परामनोविज्ञान के हज़ारों केंद्र खुल चुके हैं। वास्तव में यह एक अत्यन्त जटिल और गहन विषय है जिसकी विवेचना थोड़े से शब्दों में नहीं की जा सकती।
अच्छे संस्कार और अच्छी वासनाओं और कामनाओं वाली मृतात्माएँ और प्रेतात्माएँ तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर रहती हैं मगर जो कुत्सित भावनाओं, वासनाओं तथा बुरे संस्कार की होती हैं, वे गुरुत्वाकर्षण के भीतर मानवीय वातावरण में ही चक्कर लगाया करती हैं।
इन दोनों प्रकार की आत्माओं को कब और किस अवसर पर मानवीय शरीर मिलेगा और वे कब संसार में लौटेंगी ?–इस विषय में कुछ भी नहीं बतलाया जा सकता।
मगर यह बात सच है कि संसार के प्रति आकर्षण और मनुष्य से संपर्क स्थापित करने की लालसा बराबर उनमें बनी रहती है। वे बराबर ऐसे लोगों की खोज में रहती हैं जिनसे उनकी वासना या उनके संस्कार मिलते-जुलते हों। जो व्यक्ति जिस अवस्था में जिस प्रकृति या स्वभाव का होता है, उसकी मृतात्मा या प्रेतात्मा भी उसी स्वभाव की होती है।
सभी प्रकार की आत्माओं से संपर्क स्थापित करने, उनकी मति-गति का पता लगाने और उनसे लौकिक सहायता प्राप्त के लिए तंत्रशास्त्र में कुल सोलह प्रकार की क्रियाएँ अथवा साधनाएं हैं। पश्चिम के देशों में इसके लिए ‘प्लेन चिट’ का अविष्कार हुआ है। मगर यह साधन पूर्ण सफल नहीं है। इसमें धोखा है। जिस मृतात्मा को बुलाने के लिए प्रयोग किया जाता है, वह स्वयं न आकर, उसके स्थान पर उनकी नक़ल करती हुई दूसरी आस-पास की भटकने वाली मामूली किस्म की आत्मा आ जाती हैं। मृतात्मा यदि बुरे विचारों, भावों और संस्कारों की हुई तो उनके लिए किसी भी साधन-पद्धति का प्रयोग करते समय मन की एकाग्रता की कम ही आवश्यकता पड़ती है मगर जो ऊँचे संस्कार, भाव-विचार और सद्भावना की आत्माएं हैं, उनको आकर्षित करने के लिए अत्यधिक मन की एकाग्रता और विचारों की स्थिरता की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि एकमात्र ‘मन’ ही ऐसी शक्ति है जिससे आकर्षित होकर सभी प्रकार की आत्माएं स्थूल, लौकिक अथवा पार्थिव जगत में प्रकट हो सकती हैं।
सबसे पहले यौगिक क्रियाओं द्वारा अपने मन को एकाग्र और शक्तिशाली बनाना पड़ता है। जब उसमें भरपूर सफलता मिल जाती है, तो तान्त्रिक पद्धति के आधार पर उनसे संपर्क स्थापित करने की चेष्टा की जाती है। भिन्न-भिन्न आत्माओं से संपर्क स्थापित करने की भिन्न भिन्न तान्त्रिक पद्धतियाँ हैं।

भाग–3
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरूदेव अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्मज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव व गुरु माँ को नमन

विश्वब्रह्मांड में क्रियाशील और सर्व्यापक परमतत्व जिसे हम परमात्मा कहते हैं, उसका एक लघु अंश है–आत्मा। उसके भीतर एक चेतनतत्व है जिसे ‘मन’ कहते हैं। जब वह चेतन तत्व अर्थात्–‘मन’ जड़तत्व (आत्मा) के संपर्क में आता है तब उसमें विकार उत्पन्न हो जाता है। तब हम ‘आत्मा’ को ‘जीवात्मा’ कहने लगते हैं। इस विश्वब्रह्मांड में एक और तत्व क्रियाशील है जिससे ‘गति’ उत्पन्न होती है, वह तत्व है–‘प्राणतत्व’। जीवात्मा भौतिक जगत में प्रवेश करने से पहले ‘प्राणतत्व’ का आवरण धारण कर लेती है। इसी आवरण को ‘प्राण शरीर’ या ‘सूक्ष्मशरीर’ कहते हैं। सूक्ष्मशरीर धारी आत्मा को ही ‘सूक्ष्मात्मा’ कहते हैं। मृत्यु के बाद हर मृतक की आत्मा को अपनी वासना के संसकारों के फल स्वरुप कुछ समय तक वासना शरीर अर्थात् प्रेतयोनि ग्रहण करना पड़ता है और अंत्येष्टि और उससे सम्बंधित सभी श्राद्ध आदि क्रियाओं के विधि पूर्वक संपन्न हो चुकने के बाद उसे प्रेत शरीर से मुक्ति मिल जाती है। प्रेत शरीर से मुक्ति के बाद मृतात्मा सूक्ष्म शरीर धारण कर अंतरिक्ष की गहराइयों में चली जाती है और वहां कुछ समय बिता कर पुनः एक नए जीवन के लिए तैयार हो जाती है। अंतरिक्ष में आत्मा द्वारा बिताया गया कुछ समय उसके लिए विश्राम की अवस्था होती है।
मृतात्माओं से संपर्क स्थापित करने के लिए दो मुख्य तरीके हैं। पहला है किसी एकान्त स्थान या कमरे के शान्त वातावरण में आधी रात के समय तेल का दीपक जलाकर एकाग्र मन से किसी तान्त्रिक मन्त्र का जप करना। दूसरा तरीका है किसी व्यक्ति को माध्यम बना कर उसके शरीर से मृतात्माओं से मंत्रबल से संपर्क स्थापित करना। मैंने( गुरुदेव ने) शुरू में पहला तरीका अपनाया।
12 अगस्त सन् 1948 । उस समय मेरी उम्र करीब 25 वर्ष की रही होगी। अन्य लोगों की तरह मैंने भी एक सपना देखा था–प्रेम का सपना। मैंने भी श्यामली से प्रेम किया था। वह भी मुझे चाहती थी। हम दोनों शीघ्र शादी कर लेना चाहते थे। श्यामली को एक युवक गजानन पहले से ही चाहता था, मगर श्यामली उससे घृणा करती थी। जब गजानन को मेरे प्रेम प्रसंग के बारे में पता चला और यह भी पता चला कि वह मुझसे शादी करना चाहती है तो वह भड़क उठा। उसने श्यामली को कई बार धमकाया। श्यामली पर उसकी धमकी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
कुछ दिन बाद मुझे एक जरुरी काम से कलकत्ता जाना पड़ा। जब लौटकर आया तो पता चला कि श्यामली की हत्या कर दी गयी है। मुझे गहरा आघात लगा। मेरे सारे सपने टूट गए और मेरे सामने एक गहरा अँधेरा छा गया। श्यामली का क़त्ल निश्चय ही गजानन ने किया था–इसमें जरा भी सन्देह नहीं था। लेकिन कोई चश्मदीद गवाह न होने और कोई सुबूत न मिलने के कारण गजानन साफ बच गया। मैं भी क्या कर सकता था ?
एक वर्ष का समय बीत गया। श्यामली की दी हुई पीली पुखराज के नग की अंगूठी मेरी उंगली में पड़ी थी। जब कभी गौर से उसकी ओर देखता तो ऐसा लगता कि श्यामली मुझे छोड़कर कहीं नहीं गयी है। किसी अदृश्य तरीके से उसका सम्बन्ध मुझसे अज्ञात रूप से बराबर बना हुआ है। तभी मेरे मन में उसकी आत्मा से संपर्क स्थापित करने की प्रेरणा जाग्रत हुई। उन दिनों मैं बनारस के ‘नगवा’ मोहल्ले में एक मकान में अकेला रहता था।
जाड़े की पूर्णमासी की रात थी। कमरे को मैंने साफ किया और जब आधी रात हुई तो चमेली के तेल का दीपक जलाया और उसके सामने बैठकर एकाग्र और स्थिर चित्त से मंत्रजप करने लगा। गंगा की तरफ वाली खिड़की खुली हुई थी। रूपहली चांदनी छनकर कमरे में भीतर आ रही थी। रात के करीब दो बजे होंगे। चारों ओर सन्नाटा। किसी के होने का कोई संकेत नहीं। तभी चांदनी के सहारे एक छाया को कमरे में प्रवेश करते देखा। पहले तो वह घने कोहरे जैसी लगी मगर बाद में वह धीरे-धीरे वर्फ जैसी ठोस और पारदर्शी हो गयी। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। तभी वह पारदर्शी छाया सुन्दर, साकार युवती के रूप में बदल गयी। उसने पलट कर पीछे की ओर देखा। मैं भी अब उसे साफ साफ देख रहा था–चमकता हुआ सांवला चेहरा, सम्मोहक आँखें। एक विचित्र सी बेचैनी से मन-प्राण जकड गया। सहसा मेरी दृष्टि पुखराज जड़ी अंगूठी पर चली गयी और वे शब्द गूंजने लगे–जब कभी भी अकेले रहोगे तो यह अंगूठी तुम्हें मेरी याद दिला देगी। तन्हाइयों में यह अंगूठी तुम्हें मेरे प्रेम का वास्ता देती रहेगी।
दीपक की मन्द रौशनी में मैंने देखा–वह युवती स्थिर दृष्टि से मेरी ओर निहार रही थी। एकाएक मैंने पूछा–कौन हो तुम ? उत्तर में एक मधुर अट्टहास मेरे कानों से टकराया। वह अट्टहास श्यामली का नहीं, किसी और युवती का था। वह युवती तभी फुसफुसाते हुए बोली–मैं मालकिन हूँ–इस मकान की मालकिन। मेरा नाम शोभा है।
शोभा !–मेरे मुख से निकल पड़ा और तभी तीन साल पहले एक घटी घटना याद आ गयी। मकान मालिक मेरे मित्र थे। उनकी ही पत्नी का नाम शोभा था। शोभा को मैंने पहले कभी नहीं देखा था। शादी के कुछ दिनों के बाद ही पता चला कि शोभा ने आत्म हत्या कर ली। आत्महत्या का कारण क्या था ?–यह अंततक मालूम न चल सका।
तुमने आत्महत्या क्यों की ?
आत्महत्या !–शोभा की आत्मा ने कहा–मैंने आत्महत्या कहाँ की थी? मेरी तो हत्या की गयी थी।
किसने की थी तुम्हारी हत्या ?
तुम्हारे मित्र और मेरे पति ने।
क्यों ?
उनको मुझपर शक हो गया था।–इतना कहकर वह सिसकने लगी। फिर थोड़ी देर बाद बोली–गजानन को तो आप जानते ही हैं।
हाँ, खूब जानता हूँ।
वह मुंझ से शादी करना चाहता था। मगर मेरे माता-पिता इसके लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने मेरी शादी आपके मित्र से कर दी। गजानन बौखला गया। चारों ओर वह मुझे बदनाम करने लगा। उस पापी ने आपके मित्र को बताया कि तुम्हारी पत्नी के साथ मेरा शारीरिक सम्बन्ध रह चुका है। वह मुझसे प्रेम करती थी। मैंने आपके मित्र को खूब समझाया, लेकिन उनको मेरी किसी बात पर विश्वास नहीं हुआ। गजानन ने मेरी जिंदगी नर्क बना दी थी। मगर अब मैं उसे नहीं छोडूंगी। अब मैं गजानन से बदला लूँगी।
दूसरे ही दिन मुझे पता चला कि गजानन अपने कमरे में मृत पाया गया। कमरे का दरवाजा भीतर से बन्द था। उसे तोड़कर जब लोग भीतर घुसे तो देखा वह विस्तर पर औंधे मुंह पड़ा था। मुंह से काफी खून विस्तर पर फैलकर बिखर गया था। गजानन की मृत्यु सबके लिए रहस्य बनी रही। परिस्थितियों को देखरेख कोई हत्या की कल्पना भी नहीं कर सकता था। अतः पुलिस ने आत्महत्या मानकर केस बंद कर दिया।
मैंने श्यामली की मृतात्मा से संपर्क करना चाहा था मगर हो गया शोभा से। अच्छा ही हुआ, एक रहस्य तो खुल गया। यह भी निष्कर्ष निकला कि मृतात्माएँ किसी न किसी तरह अपना बदला लेकर ही मानती हैं। मगर भौतिक दृष्टि से लोगों को कार्य-कारण सम्बन्ध अंततक समझ में नहीं आता।

आगे है–‘श्यामली की मृतात्मा से संपर्क’।

भाग–4
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श्यामली की आत्मा और दादाजी की आत्मा से संपर्क ********************************
शोभा की आत्मा से संपर्क करने के बाद मैंने कई बार श्यामली की मृतात्मा से संपर्क करना चाहा मगर बराबर असफल रहा। कारण समझ में नहीं आया। श्यामली से संपर्क होने के बजाय आस-पास की भटकती अतृप्त आत्माओं से मेरा संपर्क हो जाता था।
आखिर एक रात इसका रहस्य खुल गया। हमेशा की तरह तेल का दीपक जलाकर आधीरात को मन्त्र जप कर रहा था। सहसा मुझे एक बिजली-सा झटका लगा। उसीके साथ मैंने देखा–सामने एक युवती खड़ी थी। मैं तुरन्त पहचान गया। वह श्यामली थी। वह मेरे करीब आना चाहती थी, पर जब भी इसके लिए प्रयास करती तो मेरे और उसके बीच कोहरा जैसा एक पतला पर्दा सा आ जाता।
श्यामली ने मुझे बतलाया–जब भी मैंने तुमसे संपर्क करने का प्रयास किया बार बार मुझे यहाँ आने के लिए कोई अदृश्य शक्ति रोक देती थी। उसके बाद उसने मुझे जो रहस्यमयी कथा सुनाई, वह निश्चय ही पारलौकिक दृष्टि से मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण थी।
गजानन ने ही उसकी हत्या की थी। काफी देर तक तो श्यामली को अपने मरने का अहसास नहीं हुआ था। जब उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हुई, उस समय तक हरिश्चन्द्र घाट पर उसकी लाश आधी से अधिक जल चुकी थी। वह मेरे पास भी पहुंची और मुझसे बात करने की भी काफी कोशिश की, मगर कर न सकी। उसको सबकुछ सपने जैसा लग रहा था। उसी स्थिति में वह न जाने कितने दिनों तक पृथ्वी के वातावरण में भटकती रही थी। कोई अदृश्य शक्ति बराबर उसे इधर-उधर ढकेलती रहती। तभी उसकी दृष्टि एक औरत पर पड़ी। उसने अनुभव किया कि उसकी वासना, भावना और संस्कार उस औरत से काफी मिलते जुलते हैं। एकाएक उस अदृश्य शक्ति के वशीभूत होकर वह उस औरत के शरीर में प्रवेश कर गयी और उसीके साथ उसकी अंतर्चेतना भी लुप्त हो गयी। जब वह वापस लौटी तो उसने अपने आपको शरीर के बन्धन में पाया। वह औरत श्यामली की माँ थी और श्यामली उसकी लड़की।
अन्त में श्यामली ने बतलाया– इस समय मैं पलंग पर अपनी माँ के पास सोई हुई हूँ। मेरे शरीर में केवल सूक्ष्मतम प्राण स्पन्दन कर रहा है। बाहरी तौर से मैं एक प्रकार से मर चुकी हूँ। अगर तुमने मुझे शीघ्र मुक्त नहीं किया तो हो सकता है कि मेरी आत्मा से मेरे शरीर का संपर्क टूट जाए।
मैंने तुरंत ही श्यामली की आत्मा को बन्धन मुक्त कर दिया।
श्यामली के संपर्क से अपनी खोज की दिशा में मुझे दो नयी बातें मालूम हुईं। पहली यह कि मृतात्मा की अंतर्चेतना यदि किसी कारण से लुप्त है तो उससे किसी भी प्रकार से संपर्क नहीं हो सकता। दूसरी बात यह कि यदि मृतात्मा ने कहीं जन्म ले लिया है तो कुछ समय तक अंतर्चेतना के कारण पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहती है। यदि समय की अवधि बढ़ गयी तो उसी स्मृति के आधार पर बालक या बालिका अपने पूर्व जन्म की बातें बतला देती है। जीवन में अंतर्चेतना का बहुत महत्व है। कोई भी शक्ति जो मृतात्मा से संपर्क स्थापित करने का आधार है, तभी सक्रिय होती है जब अंतर्चेतना जाग्रत रहती है।
इसी संदर्भ में मैं एक दूसरी विचित्र रोमांचक घटना सुनाये दे रहा हूँ। मैंने दूसरी विधि के अनुसार अपने एक मित्र के लडके राघव को माध्यम बनाया और उस पर अपने दादाजी की आत्मा का आवाहन करने का प्रयास किया। उनकी मृत्यु एक साल के अन्दर ही हुई थी। वे साधक पुरुष थे। उनका जीवन सात्विक और त्यागमय था। चार घंटे के अथक प्रयत्न के बाद उनकी आत्मा आई। मैंने वास्तविकता को समझने के लिए तुरंत प्रश्न किया–आपकी मृत्यु कब किस दिन हुई थी ?
आत्मा ने सही सही उत्तर दिया।
आपका अस्तित्व इस समय कहाँ है ?–मैंने पुनः प्रश्न किया।
पृथ्वी से बहुत दूर अंतरिक्ष में । इसीलिए आने में इतना समय लगा है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी हमारे लिए बाधक है। इससे भी अधिक कठिन है मनुष्य से संपर्क स्थापित करना।–दादाजी की आत्मा ने मुझे बतलाया।
मृत्यु के तुरंत बाद क्या आप मानव अस्तित्व से सम्बन्ध भंग कर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल गए थे ?
नहीं, कुछ समय तक मृत्यु के बाद प्राप्त नए जीवन और नए वातावरण को समझने का मैंने प्रयास किया और अपनी चिता के जलने तक यहाँ रहा, फिर गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल गया।
क्या आपको अपने परिवार के सदस्यों का स्मरण होता है ?
क्यों नहीं, मगर उन्हीं सदस्यों के विषय में अधिक सोचता हूँ जिनका मुझसे जीवनकाल में सबसे अधिक आत्मीय सम्बन्ध था।
क्या आप मुझे कोई सन्देश देना चाहते हैं ?
हाँ, भविष्य से सम्बंधित कुछ बातें बतला देता हूँ। तुम्हारी कल्याणकारी प्रवृत्ति उपकार, दया, करुणा की भावना ही तुम्हारे नाश का कारण बनेगी। परिवार में तुम्हारा अपना कोई न होगा। सभी तुम्हारे प्रति स्वार्थी होंगे। तुम्हारी मानसिक और वैचारिक उच्चता को साधरण लोग नहीं समझ सकेंगे। नारी के प्रति सदा तुम्हारे हृदय में स्नेह, प्रेम और अपनत्व की भावना रहेगी। मगर बार बार तुम्हें उससे धोखा मिलेगा। सन् 1970 से 1980 के बीच का समय तुम्हारे लिए मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक संक्रांति का काल होगा। 1970 के प्रारम्भ में तुम्हारे जीवन में आने वाली एक स्त्री इस संक्रांति काल का मुख्य कारण बनेगी। तुम उस स्त्री के जघन्य अपराधों और भयंकर पापों को धोने का काफी प्रयास करोगे और उसके कलुषित जीवन में अध्यात्म का संचार करने का भी प्रयास करोगे मगर इसका परिणाम उल्टा ही होगा। समझ लो एक चोर को साधू नहीं बनाया जा सकता। पर एक साधू को बड़ी सरलता से चोर अवश्य बनाया जा सकता है।
इतना कहकर दादाजी की आत्मा अन्तर्ध्यान हो गयी।

आगे है–‘डाकू मानसिंह की आत्मा से संपर्क’।

भाग–5
**********
डाकू मानसिंह की आत्मा से संपर्क

दादाजी की आत्मा तो अन्तर्ध्यान हो गयी मगर दूसरे ही क्षण राघव(माध्यम) का पूरा शरीर बुरी तरह कांपने लगा। जैसे मिर्गी का दौरा पड़ गया हो उसे। चेहरा काला पड़ गया और ऑंखें लाल हो उठीं। मैं सोच ही रहा था –दादाजी की आत्मा के जाते ही राघव को क्या हो गया। मैंने तान्त्रिक क्रिया बन्द कर दी। उसका भी कोई कुपरिणाम नहीं हो सकता था। मैं एकटक राघव की ओर देख रहा था।
अचानक ख्याल आया कि सम्भव है–राघव की आत्मा दादाजी की आत्मा की शक्ति से विचलित हो गयी हो और उसीका यह परिणाम हो।
मगर नहीं, मेरा विचार सही नहीं था। एकाएक राघव चीख पड़ा और उसीके साथ अट्टहास करते हुए बोला–जानते नहीं, मैं कौन हूँ ?
राघव के चीखने व अट्टहास करने के ढंग से मैं समझ गया कि उस पर कोई तमोगुणी दुष्ट आत्मा आ गयी है।
मैं डाकू मानसिंह हूँ।
यह सुनकर मैं घबरा गया। हाथ से माला छूटकर गिर गयी। किसी प्रकार अपने को संभाला और फिर शान्त स्वर में पूछा–मैंने तो आपको बुलाया नहीं, फिर आप कैसे आ गए ?
मैं रामनगर की रामलीला देखने प्रतिदिन जाता हूँ, इधर से ही गुजरता हूँ। मुझे यहाँ का वातावरण अच्छा लगा। थोड़ी शान्ति का अनुभव हुआ। इस लडके की आत्मा सोई हुई मिली, इसकी अंतर्चेतना भी लुप्त मिली तो मैंने सोचा और फिर आ गया।
आपकी क्या इच्छा है, क्या चाहिए आपको ?
काफी दिनों से भूखा हूँ, खाना खिला सकते हो ?
क्या खाएंगे आप ?
मुर्गे का गोश्त और शराब…
अभी मानसिंह का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि उसीके साथ झनझना कर सौ रूपये के सिक्के ज़मीन पर मेरे चारों तरफ गिरकर बिखर गए। कहाँ से और किधर से आये रूपये ?–मैं तत्काल समझ न सका। तभी कड़कड़ाती हुई आवाज़ गूंजी–ये रुपये मेरे हैं। आपको मुर्गा और शराब लाने के लिए दिए हैं।
हे भगवान ! कहाँ फंस गया मैं ? तत्काल मैंने अपने एक साथी को रात ग्यारह बजे मुर्गे का गोश्त और शराब की बोतल लाने के लिए भेज दिया। मैं जान गया था कि बिना खाये-पिये मानसिंह की आत्मा पिण्ड नहीं छोड़ने वाली।
मैंने सामने गोश्त की प्लेट और शराब की बोतल राख दी। राघव के माध्यम से डाकू मानसिंह की आत्मा ने दस मिनट के अन्दर प्लेट का सारा गोश्त और शराब की बोतल खाली कर दी।
मैं भौंचक्का सा देख रहा था। फिर मैंने पूछा–अब तो आप जायेंगे न ?
हाँ, अब मैं जाऊंगा, मगर सुनो, तुमने मेरी सहायता की है, इसके बदले तुम मुझसे क्या चाहते हो ?
मैंने मन में सोचा–एक भयंकर डाकू की दुष्ट आत्मा से मुझे भला क्या काम ? फिर मैंने विनम्र स्वर में कहा–बस, आपकी मेहरबानी चाहिए।
मेरी बात सुनकर डाकू मानसिंह की आत्मा एकबारगी खिलखिला कर हंस पड़ी। फिर सहज स्वर में बोली–तुम मुझसे भले ही डर रहो हो, डर से कुछ न मांग रहे हो। मगर मैं तुम्हारी एन मौकों पर बराबर मदद किया करूँगा–यह डाकू मानसिंह का वादा है।
मानसिंह की आत्मा के अन्तिम शब्दों के साथ ही राघव सहज हो उठा। डाकू मानसिंह की आत्मा जा चुकी थी। वह आँखें फाड़कर अँधेरे कमरे में चारों ओर देखने लगा।
राघव ! अब तुमको कैसा लग रहा है ?–मैंने पूछा।
बस, ऐसा लग रहा है कि गहरी नींद से मैं अचानक जाग पड़ा।
आत्माओं से संपर्क करने की सच्ची कहानी तो यहाँ ख़त्म हो गयी। मगर अन्त में दो बातें बतला देना जरुरी समझता हूँ। पहली बात यह कि दादाजी की आत्मा ने जो भविष्यवाणियाँ की थीं, वे सत्य सिद्ध हुईं। दूसरी बात यह कि डाकू मानसिंह की आत्मा ने अदृश्य रूप से कई विषम परिस्थिति में मेरी आर्थिक सहायता की। आज भी उसकी आत्मा रामनगर की रामलीला देखने आती है और यह कि वह डाकू की आत्मा थी तो क्या हुआ। डाकू अपने वायदे के पक्के होते हैं। उसने बार बार अपना वादा समय पर निभाया। बिकट स्थिति में भी वह मेरी आर्थिक सहायता करती रही।

समाप्त |||

आखिर क्यों करते हैं मंत्रोच्चार?
जानिये मंत्र विज्ञान के अध्यात्मिक व वैज्ञानिक फ़ायदे!!!
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शास्त्रकार कहते हैं-
‘मननात् त्रायते इति मंत्र:’
अर्थात मनन करने पर जो त्राण दे या रक्षा करे वही मंत्र है। धर्म, कर्म और मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रेरणा देने वाली शक्ति को मंत्र कहते हैं। तंत्रानुसार देवता के सूक्ष्म शरीर को या इष्टदेव की कृपा को मंत्र कहते हैं।
सही अर्थ में मंत्र जप का उद्देश्य अपने इष्ट को स्मरण करना है।

मंत्र शब्द संस्कृत भाषा से है। संस्कृत के आधार पर मंत्र शब्द का अर्थ सोचना, धारणा करना , समझना व् चाहना होता है। केवल हिन्दुओ में ही नहीं वरन बौध्द, जैन , सिक्ख आदि सभी धर्मों में मंत्र जप किया जाता है। मुस्लिम भाई भी तस्बियां घुमाते है।

हजारों वर्ष पूर्व मंत्र शक्ति के रहस्य को प्राचीनकाल में वैदिक ऋषियों ने ढूंढ निकाला था। उन्होंने उनकी शक्तियों को जानकर ही वेद मंत्रों की रचना की। वैदिक ऋषियों ने ब्रह्मांड की सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट ध्वनियों को सुना और समझा। इसे सुनकर ही उन्होंने मंत्रों की रचना की। उन्होंने जिन मंत्रों का उच्चारण किया, उन मंत्रों को बाद में संस्कृत की लिपि मिली और इस तरह संपूर्ण संस्कृत भाषा ही मंत्र बन गई। संस्कृत की वर्णमाला का निर्माण बहुत ही सूक्ष्म ध्वनियों को सुनकरकिया गया।

मंत्र को सदगुरू के माध्यम से ही ग्रहण करना उचित होता है| सदगुरू ही सही रास्ता दिखा सकते हैं, मंत्र का उच्चारण, जप संख्या, बारीकियां समझा सकते हैं, और साधना काल में विपरीत परिश्तिती आने पर साधक की रक्षा कर सकते हैं|

साधक की प्राथमिक अवशता में सफलता व् साधना की पूर्णता मात्र सदगुरू की शक्ति के माध्यम से ही प्राप्त होती है| यदि साधक द्वारा अनेक बार साधना करने पर भी सफलता प्राप्त न हो, तो सदगुरू विशेष शक्तिपात द्वारा उसे सफलता की मंजिल तक पहुंचा देते हैं|

इस प्रकार मंत्र जप के माध्यम से नर से नारायण बना जा सकता है, जीवन के दुखों को मिटाया जा सकता है तथा अदभुद आनन्द, असीम शान्ति व् पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि मंत्र जप का अर्थ मंत्र कुछ शब्दों को रतना है, अपितु मंत्र जप का अर्थ है – जीवन को पूर्ण बनाना|

मंत्र साधना भी कई प्रकार की होती है। मं‍त्र से किसी देवी या देवता को साधा जाता है और मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी साधा जाता है। ‘मंत्र’ का अर्थ है मन को एक तंत्र में लाना। मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है, तब वह सिद्ध होने लगता है। ‘मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है।

भगवन श्रीकृष्ण जी ने गीता के १० वें अध्याय के २५ वें श्लोक में ‘जपयज्ञ’ को अपनी विभूति बताया है। जपयज्ञ सब के लिए आसान है। इसमें कोई ज्यादा खर्च नही , कोई कठोर नियम नही। यह जब चाहो तब किया जा सकता है।

मंत्र के प्रकार
मंत्र 3 प्रकार के होते हैं : 1. स्त्रीलिंग, 2. पुल्लिंग और 3. नपुंसक लिंग।

1. स्त्रीलिंग : ‘स्वाहा’ से अंत होने वाले मंत्र स्त्रीलिंग हैं।
2. पुल्लिंग : ‘हूं फट्’ वाले पुल्लिंग हैं।
3. नपुंसक : ‘नमः’ अंत वाले नपुंसक हैं।

*मंत्रों के शास्त्रोक्त प्रकार : 1. वैदिक, 2. पौराणिक और 3. साबर।
*कुछ विद्वान इसके प्रकार अलग बताते हैं : 1. वैदिक, 2. तांत्रिक और 3. साबर।

*वैदिक मंत्र के प्रकार : 1. सात्विक और 2. तांत्रिक।
* वैदिक मंत्रों के जप के प्रकार : 1. वैखरी, 2. मध्यमा, 3. पश्यंती और 4. परा।

1. वैखरी : उच्च स्वर से जो जप किया जाता है, उसे वैखरी मंत्र जप कहते हैं।
2. मध्यमा : इसमें होंठ भी नहीं हिलते व दूसरा कोई व्यक्ति मंत्र को सुन भी नहीं सकता।
3. पश्यंती : जिस जप में जिह्वा भी नहीं हिलती, हृदयपूर्वक जप होता है और जप के अर्थ में हमारा चित्त तल्लीन होता जाता है, उसे पश्यंती मंत्र जाप कहते हैं।
4. परा : मंत्र के अर्थ में हमारी वृत्ति स्थिर होने की तैयारी हो, मंत्र जप करते-करते आनंद आने लगे तथा बुद्धि परमात्मा में स्थिर होने लगे, उसे परा मंत्र जप कहते हैं।

जप का प्रभाव : वैखरी से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव मध्यमा में होता है। मध्यमा से 10 गुना प्रभाव पश्यंती में तथा पश्यंती से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव परा में होता है। इस प्रकार परा में स्थित होकर जप करें तो वैखरी का हजार गुना प्रभाव हो जाएगा।

*पौराणिक मंत्र के प्रकार :
पौराणिक मंत्र जप के प्रकार : 1. वाचिक, 2. उपांशु और 3. मानसिक।

1. वाचिक : जिस मंत्र का जप करते समय दूसरा सुन ले, उसको वाचिक जप कहते हैं।
2. उपांशु : जो मंत्र हृदय में जपा जाता है, उसे उपांशु जप कहते हैं।
3. मानसिक : जिसका मौन रहकर जप करें, उसे मानसिक जप कहते हैं।

* वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ध्वनि तरंगें ऊर्जा का ही एक रूप हैं। मंत्र में निहित बीजाक्षरों में उच्चारित ध्वनियों से शक्तिशाली विद्युत तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो चमत्कारी प्रभाव डालती हैं।

* सकारात्मक ध्वनियां शरीर के तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं जबकि नकारात्मक ध्वनियां शरीर की ऊर्जा तक का ह्रास कर देती हैं। मंत्र और कुछ नहीं, बल्कि सकारात्मक ध्वनियों का समूह है, जो विभिन्न शब्दों के संयोग से पैदा होते हैं।

* मंत्रों की ध्वनि से हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों सकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं। स्थूल शरीर जहां स्वस्थ होने लगता हैं, वहीं जब सूक्ष्म शरीर प्रभावित होता है तो हम में या तो सिद्धियों का उद्भव होने लगता है या हमारा संबंध ईथर माध्यम से हो जाता है और इस तरह हमारे मन व मस्तिष्क से निकली इच्छाएं फलित होने लगती हैं।

* निश्चित क्रम में संग्रहीत विशेष वर्ण जिनका विशेष प्रकार से उच्चारण करने पर एक निश्चित अर्थ निकलता है। अंत: मंत्रों के उच्चारण में अधिक शुद्धता का ध्यान रखा जाता है। अशुद्ध उच्चारण से इसका दुष्प्रभाव भी हो सकता है।

* रामचरित मानस में मंत्र जप को भक्ति का 5वां प्रकार माना गया है। मंत्र जप से उत्पन्न शब्द शक्ति संकल्प बल तथा श्रद्धा बल से और अधिक शक्तिशाली होकर अंतरिक्ष में व्याप्त ईश्वरीय चेतना के संपर्क में आती है जिसके फलस्वरूप मंत्र का चमत्कारिक प्रभाव साधक को सिद्धियों के रूप में मिलता है।
श्रीरामचरित्र मानस में नवधा भक्ति का जिकर भी आता है। इसमें रामजी शबरी को कहते है की
‘मंत्र जप मम दृढ विस्वास ,
पंचम भक्ति सो वेद प्रकासा ‘
अर्थार्थ मंत्र जप और मुझमे पक्का विश्वास रखो।

* शाप और वरदान इसी मंत्र शक्ति और शब्द शक्ति के मिश्रित परिणाम हैं। साधक का मंत्र उच्चारण जितना अधिक स्पष्ट होगा, मंत्र बल उतना ही प्रचंड होता जाएगा।

* मंत्रों में अनेक प्रकार की शक्तियां निहित होती हैं जिसके प्रभाव से देवी-देवताओं की शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र एक ऐसा साधन है, जो मनुष्य की सोई हुई सुसुप्त शक्तियों को सक्रिय कर देता है।

केन्द्रो पर मंत्र प्रभाव
हमारे शरीर में ७ केंद्र होते है। उनमे से नीचे के में घृणा , ईर्ष्या, भय, स्पर्धा , काम आदि होते है। लेकिन मंत्र जप के प्रभाव से जपने वाले का भय निर्भयता में , घृणा प्रेम में और काम राम में बदल जाता है।

प्रथम केंद्र मूलाधार होता है।

दूसरा स्वाधिष्ठान केंद्र होता है इसमें चिंता निश्चिंता में बदलती है। तीसरा केंद्र मणिपुर है। जिससे रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है। क्षमा शक्ति विकसित होती है।

सात बार ओम या हरिओम मंत्र का गुंजन करने से मूलाधार केंद्र में स्पंदन होता है जिससे रोगो के कीटाणु नष्ट होते है। क्रोध के हमारी जीवनी शक्ति का नाश होता है। वैज्ञानिकों का कहना है की यदि एक घंटे तक क्रोध करनेवाले व्यक्ति के श्वासों के कण इकट्ठे करके अगर इंजेक्शन बनाया जाये तो उस इंजेक्शन से २० लोगो को मारा जा सकता है।

यदि एक घंटे के क्रोध से २० लोगो की मृत्यु हो सकती है तो एक घंटे के हरिनाम कीर्तन से असंख्यों लोगों को आनंद व् मन की शांति मिलती है। मंत्र शक्ति में आश्चर्य नही तो क्या है। मंत्रशक्ति के द्वारा ये सब संभव है।

मंत्र जप और स्वास्थ्य
लगातार मंत्र जप करने से उछ रक्तचाप, गलत धारणायें, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं| मंत्र जप का साइड इफेक्ट (Side Effect) यही है|
मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दिम करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है|
“क्लीं ह्रीं” इत्यादि बीजाक्षरों का एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर ह्रदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व् उनके विकार नष्ट होते हैं|

जप के लिये ब्रह्म मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय पूरा वातावरण शान्ति पूर्ण रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहर या शोर नहीं होता| कुछ विशिष्ट साधनाओं के लिये रात्रि का समय अत्यंत प्रभावी होता है| गुरु के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए| सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है|

अपूर्व आभा
मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे से एक अपूर्व आभा आ जाति है| आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वास्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगे, तो इसके परिणाम स्वरुप मुखमंडल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही|

जप माला
जप करने के लिए माला एक साधन है| शिव या काली के लिए रुद्राक्ष माला, हनुमान के लिए मूंगा माला, लक्ष्मी के लिए कमलगट्टे की माला, गुरु के लिए स्फटिक माला – इस प्रकार विभिन्न मंत्रो के लिए विभिन्न मालाओं का उपयोग करना पड़ता है|

मानव शरीर में हमेशा विद्युत् का संचार होता रहता है| यह विद्युत् हाथ की उँगलियों में तीव्र होता है| इन उँगलियों के बीच जब माला फेरी जाती है, तो लयात्मक मंत्र ध्वनि (Rythmic sound of the Hymn) तथा उँगलियों में माला का भ्रमण दोनों के समन्वय से नूतन ऊर्जा का प्रादुर्भाव होता है|

जप माला के स्पर्श (जप के समय में) से कई लाभ हैं –
* रुद्राक्ष से कई प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं|
* कमलगट्टे की माला से शीतलता एव अआनंद की प्राप्ति होती है|
* स्फटिक माला से मन को अपूर्व शान्ति मिलती है|

दिशा
दिशा को भी मंत्र जप में आत्याधिक महत्त्व दिया गया है| प्रत्येक दिशा में एक विशेष प्रकार की तरंगे (Vibrations) प्रवाहित होती रहती है| सही दिशा के चयन से शीघ्र ही सफलता प्राप्त होती है|

जप-तप
जप में तब पूर्णता आ जाती है, पराकाष्टा की स्थिति आ जाती है, उस ‘तप’ कहते हैं| जप में एक लय होता है| लय का सरथ है ध्वनि के खण्ड| दो ध्वनि खण्डों की बीच में निःशब्दता है| इस निःशब्दता पर मन केन्द्रित करने की जो कला है, उसे तप कहते हैं| जब साधक तप की श्तिति को प्राप्त करता है, तो उसके समक्ष सृष्टि के सारे रहस्य अपने आप अभिव्यक्त हो जाते हैं| तपस्या में परिणति प्राप्त करने पर धीरे-धीरे हृदयगत अव्यक्त नाद सुनाई देने लगता है, तब वह साधक उच्चकोटि का योगी बन जाता है| ऐसा साधक गृहस्थ भी हो सकता है और संन्यासी भी|

कर्म विध्वंस
मनुष्य को अपने जीवन में जो दुःख, कष्ट, दारिद्य, पीड़ा, समस्याएं आदि भोगनी पड़ती हैं, उसका कारण प्रारब्ध है| जप के माध्यम से प्रारब्ध को नष्ट किया जा सकता है और जीवन में सभी दुखों का नाश कर, इच्छाओं को पूर्ण किया जा सकता है, इष्ट देवी या देवता का दर्शन प्राप्त किया जा सकता है|

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Raksha (Protection) Mantra:

This mantra is known as Raksha – Suraksha OR Protection Mantra. This Mantra chanted by Jain Muni with Jain Mantras but I am sure anyone can play this Mantra with positive intent. I personally noticed its working and highly recommend to all.

आत्मरक्षाकर स्तोत्र

ऐसा माना गया है कि…घर से निकलते समय यदि यह मंत्र का ऑडियो भी सुन लिया जाये तो एक्सीडेंट होने की सम्भावना नहीं रहती व मृत्यु तुल्य दुर्घटना की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है । यात्रा प्रारम्भ करने से पहले यह स्तोत्र अवश्य ही
सुनना चाहिए ।

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Disclaimer

जानिए आपका कौन सा चक्र बिगड़ा है और उसे कैसे ठीक करे: –

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(1) मूलाधार चक्र- गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला ‘आधार चक्र’ है।आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता,धन,समृधि ,आत्मबल,शारीरिक बल,रोजगार कर्मशीलता,घाटा,असफलता रक्त एवं हड्डी के रोग,कमर व पीठ में दर्द ,आत्महत्या के बिचार,डिप्रेशन,केंसर अ।दि होता है।

(2) स्वाधिष्ठान चक्र- इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है ।उसकी छ:पंखुरियाँ हैं।इसके बिगड़ने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता,बाँझपन ,मंद्बुधिता,मूत्राशय और गर्भाशय के रोग ,अध्यात्मिक सिद्धी में बाधा बैभव के आनंद में कमी अदि होता है।

(3) मणिपूर चक्र- नाभि में दस दल वाला मणिपूर चक्रहै। इसके इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता,गुस्सा,चिंचिरापन, नशाखोरी,तनाव ,शंकलुप्रबिती,कई तरह की बिमारिया,दवावो का काम न करना,अज्ञातभय,चहरेक।तेजगायब ,धोखाधड़ी,डिप्रेशन,उग्रता
हिंशा,दुश्मनी,अपयश,अपमान,आलोचना,बदले की भावना ,एसिडिटी ,ब्लडप्रेशर,शुगर,थाईरायेड,सिर एवं शारीर के दर्द,किडनी ,लीवर ,केलोस्ट्राल,खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।

(4) अनाहत चक्र- हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है। इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़-फोड़, कुतर्क, चिन्ता,नफरत ,प्रेम में असफलता ,प्यार में धोखा ,अकेलापन ,अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी ,मन में उदासी, जीवन में बिरानगी ,सबकुछ होते हुए भी बेचैनी ,छाती में दर्द ,साँस लेने में दिक्कत,सुख का अभाव,ह्रदय व फेफड़े के रोग,केलोस्ट्राल में बढ़ोतरी आदि।

(5) विशुद्ध चक्र –कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है।यह सोलह पंखुरियों वाला है।यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष,अभिब्यक्तिमें कमी,गले,नाक,कान,दात, थाईरायेड, आत्मजागरण में बाधा आती है।

(6) आज्ञा चक्र – भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इसके बिगड़ने पर एकाग्रता,जीने की चाह,निर्णय की सक्ति, मानसिक सक्ति,सफलता की राह में अडचने आदि इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा ।

(7) सहस्रार चक्र -सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है। शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव,भाग्य का साथ न देना अदि ।

उपाय

अभिमंत्रित 7 चक्र ब्रेसलेट धारण किजये।

चक्रो को सही करने के लिए चक्र के बीज मंत्र के जाप करे।

नीचे उपाय के पिक्चर्स ओर मंत्र का लिंक दिया गया है।
7 Chakra Bracelet। 7 चक्र ब्रेसलेट


Chakra Beej Mantra। चक्र बीज मंत्र:

7 Chakra IMage with Beej Mantra

7 Chakra Beej Mantras:

Chakra-beej-mantras-the-sounds-of-the-chakras

Chakra Chanting Video

वास्तु और 7 चक्

अगर घर मे वास्तु दोष रहेगा तो उसकी वजह से भी चक्ररा इम्बलनसे हो सकते है।

नंबर्स और चक्र

आपकी जन्म तारीख में मिसिंग नंबर्स का भी नेगेटिव प्रभाव चक्रो पे हो सकता है।

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