In Conversation with Dead

By Acharya Vijay Shankari:

*———–:मृतात्माओं से संपर्क:————-*
******************
*भाग–1 व 2*
***************
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्मज्ञानगंगा में पावन अवगाहन
पूज्य गुरूदेव व गुरु माँ का कोटि कोटि वन्दन
(पारलौकिक जगत का अस्तित्व है–इसमें सन्देह नहीं। भूत-प्रेत जैसी अशरीरी आत्माओं का अस्तित्व है–इसमें भी सन्देह नहीं। इन सबके सम्बन्ध में जो कुछ देखा है, अनुभव किया है, उन्हींको अपनी भाषा में लिपिबद्ध कर प्रस्तुत कर रहा हूँ—
——परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव श्री।)
परामनोविज्ञान से एम्. ए. करने के बाद मन में आत्माओं के सम्बन्ध में जिज्ञासाओं का उत्पन्न होना स्वाभाविक था। उस समय प्रेतविद्या अथवा आत्म विद्या पर शोध करने की व्यवस्था विश्व विद्यालयों में नहीं थी। अतः मैंने व्यक्तिगत रूप से इस विषय पर खोज करने का निश्चय कर लिया। सबसे पहले मैंने इन दोनों विषयों से सम्बंधित तमाम पुस्तकों तथा हस्त लिखित ग्रन्थों का संग्रह किया। ऐसी पुस्तकों का जो संग्रह मेरे पास है, वैसा शायद ही किसीके पास हो। खोज के सिलसिले में मैंने यह जाना कि आत्माओं के कई भेद हैं, जिनमें जीवात्मा, मृतात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा–ये चार मुख्य हैं।
मृत्यु के बाद मनुष्य कहाँ जाता है और उसकी आत्मा किस अवस्था में रहती है ?–इस विषय में मुझे बचपन से कौतूहल रहा है। सच तो यह है कि मृत्यु के विषय में भय और शोक की भावना से कहीं अधिक जिज्ञासा का भाव मेरे मन में रहा है। शायद इसी कारण मैंने परामनोविज्ञान में एम्. ए. किया और शोध शुरू किया।
वास्तव में मृत्यु जीवन का अन्त नहीं। मृत्यु के बाद भी जीवन है। जैसे दिनभर के श्रम के बाद नींद आवश्यक है, उसी प्रकार जीवनभर के परिश्रम और भाग-दौड़ के बाद मृत्यु आवश्यक है। मृत्यु जीवनभर की थकान के बाद हमें विश्राम और शान्ति प्रदान करती है जिसके फल स्वरुप हम पुनः तरोताजा होकर नया जीवन शुरू करते हैं।
मेरी दृष्टि में मृत्यु का अर्थ है–गहरी नींद जिससे जागने पर हम नया जीवन, नया वातावरण और नया परिवार पाते हैं, फिर हमारी नयी यात्रा शुरू होती है। स्वर्ग-
नर्क केवल कल्पना मात्र है। शास्त्रों में इनकी कल्पना इसलिए की गयी है कि लोग पाप से बचें और सत् कार्य की ओर प्रवृत्त हों। नर्क का भय उन्हें दुष्कार्य से बचाएगा और स्वर्ग सुख की लालसा उन्हें पुण्य कार्य या सत् कार्य की ओर प्रेरित करेगी। जो कुछ भी हैं–वे हमारे विचार हैं, हमारी भावनाएं हैं जिनके ही अनुसार मृत्यु उपरांत हमारे लिए वातावरण तैयार होता है।
मृत्यु एक मंगलकारी क्षण है, एक सुखद और आनंदमय अनुभव है। मगर हम उसे अपने कुसंस्कार, वासना, लोभ-लालच आदि के कारण दारुण और कष्टमय बना लेते हैं। इन्ही सबका संस्कार हमारी आत्मा पर पड़ता रहता है जिससे हम मृत्यु के अज्ञात भय से त्रस्त रहते हैं।
मृत्यु के समय एक नीरव विस्फोट के साथ स्थूल शरीर के परमाणुओं का विघटन शुरू हो जाता है और शरीर को जला देने या ज़मीन में गाड़ देने के बाद भी ये परमाणु वातावरण में बिखरे रहते हैं। लेकिन उनमें फिर से उसी आकृति में एकत्र होने की प्रवृत्ति तीव्र रहती है। साथ ही इनमें मनुष्य की अतृप्त भोग-वासनाओं की लालसा भी बनी रहती है। इसी स्थिति को ‘प्रेतात्मा’ कहते हैं। प्रेतात्मा का शरीर आकाशीय वासनामय होता है। मृत्यु के बाद और प्रेतात्मा के बनने की पूर्व की अल्प अवधि की अवस्था को ‘मृतात्मा’ कहते हैं। मृतात्मा और प्रेतात्मा में बस थोड़ा-सा ही अन्तर है। वासना और कामना अच्छी-बुरी दोनों प्रकार की होती हैं। स्थूल शरीर को छोड़कर जितने भी शरीर हैं, सब भोग शरीर हैं। मृत आत्माओं के भी शरीर भोग शरीर हैं। वे अपनी वासनाओं-कामनाओं की पूर्ति के लिए जीवित व्यक्ति का सहारा लेती हैं। मगर उन्हीं व्यक्तियों का जिनका हृदय दुर्बल और जिनके विचार, भाव, संस्कार आदि उनसे मिलते-जुलते हैं।
मृतात्माओं का शरीर आकाशीय होने के कारण उनकी गति प्रकाश की गति के समान होती है। वे एक क्षण में हज़ारों मील की दूरी तय कर लेती हैं।
भाग–2
*******
जीवित व्यक्तियों के शरीर में मृतात्माएँ या प्रेतात्माएँ कैसे प्रवेश करती हैं ?
मृतात्माएँ अपने संस्कार और अपनी वासनाओं को जिस व्यक्ति में पाती हैं, उसीके माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर अपनी कामना पूर्ति कर लिया करती हैं। उदहारण के लिए–जैसे किसी व्यक्ति को पढ़ने-लिखने का शौक अधिक है, वह उसका संस्कार बन गया। उसमें पढ़ना-लिखना उसकी वासना कहलायेगी। जब कभी वह अपने संस्कार या अपनी वासना के अनुसार पढ़ने-लिखने बैठेगा, उस समय कोई मृतात्मा जिसकी भी वही वासना रही है, तत्काल उस व्यक्ति की ओर आकर्षित होगी और वासना और संस्कार के ही माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर अपनी वासना की पूर्ति कर लेगी। दूसरी ओर उस व्यक्ति की हालत यह होगी कि वह उस समय का पढ़ा-लिखा भूल जायेगा। किसी भी प्रकार का उसमें अपना संस्कार न बन पायेगा।
इसी प्रकार अन्य वासना, कामना और संस्कार के विषय में भी समझना चाहिए। हमारी जिस वासना को मृतात्माएँ भोगती हैं, उसका परिणाम हमारे लिए कुछ भी नहीं होता। इसके विपरीत, कुछ समय के लिए उस वासना के प्रति हमारे मन में अरुचि पैदा हो जाती है।
प्रेतात्माओं के अपने अलग ढंग हैं। वे जिस व्यक्ति को अपनी वासना-कामना अथवा अपने संस्कार के अनुकूल देखती हैं, तुरन्त सूक्ष्मतम प्राणवायु अर्थात्-ईथर के माध्यम से उसके शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और अपनी वासना को संतुष्ट करने लग जाती हैं। इसीको ‘प्रेतबाधा’ कहते हैं। ऐसे व्यक्ति की बाह्य चेतना को प्रेतात्माएँ लुप्त कर उसकी अंतर्चेतना को प्रभावित कर अपनी इच्छानुसार उस व्यक्ति से काम करवाती हैं। इनके कार्य, विचार, भाव उसी व्यक्ति जैसे होते हैं जिस पर वह आरूढ़ होती है।
कहने की आवश्यकता नहीं, इस विषय में पाश्चात्य देशों में अनेक अनुसन्धान हो रहे हैं। परामनोविज्ञान के हज़ारों केंद्र खुल चुके हैं। वास्तव में यह एक अत्यन्त जटिल और गहन विषय है जिसकी विवेचना थोड़े से शब्दों में नहीं की जा सकती।
अच्छे संस्कार और अच्छी वासनाओं और कामनाओं वाली मृतात्माएँ और प्रेतात्माएँ तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर रहती हैं मगर जो कुत्सित भावनाओं, वासनाओं तथा बुरे संस्कार की होती हैं, वे गुरुत्वाकर्षण के भीतर मानवीय वातावरण में ही चक्कर लगाया करती हैं।
इन दोनों प्रकार की आत्माओं को कब और किस अवसर पर मानवीय शरीर मिलेगा और वे कब संसार में लौटेंगी ?–इस विषय में कुछ भी नहीं बतलाया जा सकता।
मगर यह बात सच है कि संसार के प्रति आकर्षण और मनुष्य से संपर्क स्थापित करने की लालसा बराबर उनमें बनी रहती है। वे बराबर ऐसे लोगों की खोज में रहती हैं जिनसे उनकी वासना या उनके संस्कार मिलते-जुलते हों। जो व्यक्ति जिस अवस्था में जिस प्रकृति या स्वभाव का होता है, उसकी मृतात्मा या प्रेतात्मा भी उसी स्वभाव की होती है।
सभी प्रकार की आत्माओं से संपर्क स्थापित करने, उनकी मति-गति का पता लगाने और उनसे लौकिक सहायता प्राप्त के लिए तंत्रशास्त्र में कुल सोलह प्रकार की क्रियाएँ अथवा साधनाएं हैं। पश्चिम के देशों में इसके लिए ‘प्लेन चिट’ का अविष्कार हुआ है। मगर यह साधन पूर्ण सफल नहीं है। इसमें धोखा है। जिस मृतात्मा को बुलाने के लिए प्रयोग किया जाता है, वह स्वयं न आकर, उसके स्थान पर उनकी नक़ल करती हुई दूसरी आस-पास की भटकने वाली मामूली किस्म की आत्मा आ जाती हैं। मृतात्मा यदि बुरे विचारों, भावों और संस्कारों की हुई तो उनके लिए किसी भी साधन-पद्धति का प्रयोग करते समय मन की एकाग्रता की कम ही आवश्यकता पड़ती है मगर जो ऊँचे संस्कार, भाव-विचार और सद्भावना की आत्माएं हैं, उनको आकर्षित करने के लिए अत्यधिक मन की एकाग्रता और विचारों की स्थिरता की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि एकमात्र ‘मन’ ही ऐसी शक्ति है जिससे आकर्षित होकर सभी प्रकार की आत्माएं स्थूल, लौकिक अथवा पार्थिव जगत में प्रकट हो सकती हैं।
सबसे पहले यौगिक क्रियाओं द्वारा अपने मन को एकाग्र और शक्तिशाली बनाना पड़ता है। जब उसमें भरपूर सफलता मिल जाती है, तो तान्त्रिक पद्धति के आधार पर उनसे संपर्क स्थापित करने की चेष्टा की जाती है। भिन्न-भिन्न आत्माओं से संपर्क स्थापित करने की भिन्न भिन्न तान्त्रिक पद्धतियाँ हैं।
भाग–3
*********
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरूदेव अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्मज्ञानगंगा में पावन अवगाहन
पूज्य गुरुदेव व गुरु माँ को नमन
विश्वब्रह्मांड में क्रियाशील और सर्व्यापक परमतत्व जिसे हम परमात्मा कहते हैं, उसका एक लघु अंश है–आत्मा। उसके भीतर एक चेतनतत्व है जिसे ‘मन’ कहते हैं। जब वह चेतन तत्व अर्थात्–‘मन’ जड़तत्व (आत्मा) के संपर्क में आता है तब उसमें विकार उत्पन्न हो जाता है। तब हम ‘आत्मा’ को ‘जीवात्मा’ कहने लगते हैं। इस विश्वब्रह्मांड में एक और तत्व क्रियाशील है जिससे ‘गति’ उत्पन्न होती है, वह तत्व है–‘प्राणतत्व’। जीवात्मा भौतिक जगत में प्रवेश करने से पहले ‘प्राणतत्व’ का आवरण धारण कर लेती है। इसी आवरण को ‘प्राण शरीर’ या ‘सूक्ष्मशरीर’ कहते हैं। सूक्ष्मशरीर धारी आत्मा को ही ‘सूक्ष्मात्मा’ कहते हैं। मृत्यु के बाद हर मृतक की आत्मा को अपनी वासना के संसकारों के फल स्वरुप कुछ समय तक वासना शरीर अर्थात् प्रेतयोनि ग्रहण करना पड़ता है और अंत्येष्टि और उससे सम्बंधित सभी श्राद्ध आदि क्रियाओं के विधि पूर्वक संपन्न हो चुकने के बाद उसे प्रेत शरीर से मुक्ति मिल जाती है। प्रेत शरीर से मुक्ति के बाद मृतात्मा सूक्ष्म शरीर धारण कर अंतरिक्ष की गहराइयों में चली जाती है और वहां कुछ समय बिता कर पुनः एक नए जीवन के लिए तैयार हो जाती है। अंतरिक्ष में आत्मा द्वारा बिताया गया कुछ समय उसके लिए विश्राम की अवस्था होती है।
मृतात्माओं से संपर्क स्थापित करने के लिए दो मुख्य तरीके हैं। पहला है किसी एकान्त स्थान या कमरे के शान्त वातावरण में आधी रात के समय तेल का दीपक जलाकर एकाग्र मन से किसी तान्त्रिक मन्त्र का जप करना। दूसरा तरीका है किसी व्यक्ति को माध्यम बना कर उसके शरीर से मृतात्माओं से मंत्रबल से संपर्क स्थापित करना। मैंने( गुरुदेव ने) शुरू में पहला तरीका अपनाया।
12 अगस्त सन् 1948 । उस समय मेरी उम्र करीब 25 वर्ष की रही होगी। अन्य लोगों की तरह मैंने भी एक सपना देखा था–प्रेम का सपना। मैंने भी श्यामली से प्रेम किया था। वह भी मुझे चाहती थी। हम दोनों शीघ्र शादी कर लेना चाहते थे। श्यामली को एक युवक गजानन पहले से ही चाहता था, मगर श्यामली उससे घृणा करती थी। जब गजानन को मेरे प्रेम प्रसंग के बारे में पता चला और यह भी पता चला कि वह मुझसे शादी करना चाहती है तो वह भड़क उठा। उसने श्यामली को कई बार धमकाया। श्यामली पर उसकी धमकी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
कुछ दिन बाद मुझे एक जरुरी काम से कलकत्ता जाना पड़ा। जब लौटकर आया तो पता चला कि श्यामली की हत्या कर दी गयी है। मुझे गहरा आघात लगा। मेरे सारे सपने टूट गए और मेरे सामने एक गहरा अँधेरा छा गया। श्यामली का क़त्ल निश्चय ही गजानन ने किया था–इसमें जरा भी सन्देह नहीं था। लेकिन कोई चश्मदीद गवाह न होने और कोई सुबूत न मिलने के कारण गजानन साफ बच गया। मैं भी क्या कर सकता था ?
एक वर्ष का समय बीत गया। श्यामली की दी हुई पीली पुखराज के नग की अंगूठी मेरी उंगली में पड़ी थी। जब कभी गौर से उसकी ओर देखता तो ऐसा लगता कि श्यामली मुझे छोड़कर कहीं नहीं गयी है। किसी अदृश्य तरीके से उसका सम्बन्ध मुझसे अज्ञात रूप से बराबर बना हुआ है। तभी मेरे मन में उसकी आत्मा से संपर्क स्थापित करने की प्रेरणा जाग्रत हुई। उन दिनों मैं बनारस के ‘नगवा’ मोहल्ले में एक मकान में अकेला रहता था।
जाड़े की पूर्णमासी की रात थी। कमरे को मैंने साफ किया और जब आधी रात हुई तो चमेली के तेल का दीपक जलाया और उसके सामने बैठकर एकाग्र और स्थिर चित्त से मंत्रजप करने लगा। गंगा की तरफ वाली खिड़की खुली हुई थी। रूपहली चांदनी छनकर कमरे में भीतर आ रही थी। रात के करीब दो बजे होंगे। चारों ओर सन्नाटा। किसी के होने का कोई संकेत नहीं। तभी चांदनी के सहारे एक छाया को कमरे में प्रवेश करते देखा। पहले तो वह घने कोहरे जैसी लगी मगर बाद में वह धीरे-धीरे वर्फ जैसी ठोस और पारदर्शी हो गयी। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। तभी वह पारदर्शी छाया सुन्दर, साकार युवती के रूप में बदल गयी। उसने पलट कर पीछे की ओर देखा। मैं भी अब उसे साफ साफ देख रहा था–चमकता हुआ सांवला चेहरा, सम्मोहक आँखें। एक विचित्र सी बेचैनी से मन-प्राण जकड गया। सहसा मेरी दृष्टि पुखराज जड़ी अंगूठी पर चली गयी और वे शब्द गूंजने लगे–जब कभी भी अकेले रहोगे तो यह अंगूठी तुम्हें मेरी याद दिला देगी। तन्हाइयों में यह अंगूठी तुम्हें मेरे प्रेम का वास्ता देती रहेगी।
दीपक की मन्द रौशनी में मैंने देखा–वह युवती स्थिर दृष्टि से मेरी ओर निहार रही थी। एकाएक मैंने पूछा–कौन हो तुम ? उत्तर में एक मधुर अट्टहास मेरे कानों से टकराया। वह अट्टहास श्यामली का नहीं, किसी और युवती का था। वह युवती तभी फुसफुसाते हुए बोली–मैं मालकिन हूँ–इस मकान की मालकिन। मेरा नाम शोभा है।
शोभा !–मेरे मुख से निकल पड़ा और तभी तीन साल पहले एक घटी घटना याद आ गयी। मकान मालिक मेरे मित्र थे। उनकी ही पत्नी का नाम शोभा था। शोभा को मैंने पहले कभी नहीं देखा था। शादी के कुछ दिनों के बाद ही पता चला कि शोभा ने आत्म हत्या कर ली। आत्महत्या का कारण क्या था ?–यह अंततक मालूम न चल सका।
तुमने आत्महत्या क्यों की ?
आत्महत्या !–शोभा की आत्मा ने कहा–मैंने आत्महत्या कहाँ की थी? मेरी तो हत्या की गयी थी।
किसने की थी तुम्हारी हत्या ?
तुम्हारे मित्र और मेरे पति ने।
क्यों ?
उनको मुझपर शक हो गया था।–इतना कहकर वह सिसकने लगी। फिर थोड़ी देर बाद बोली–गजानन को तो आप जानते ही हैं।
हाँ, खूब जानता हूँ।
वह मुंझ से शादी करना चाहता था। मगर मेरे माता-पिता इसके लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने मेरी शादी आपके मित्र से कर दी। गजानन बौखला गया। चारों ओर वह मुझे बदनाम करने लगा। उस पापी ने आपके मित्र को बताया कि तुम्हारी पत्नी के साथ मेरा शारीरिक सम्बन्ध रह चुका है। वह मुझसे प्रेम करती थी। मैंने आपके मित्र को खूब समझाया, लेकिन उनको मेरी किसी बात पर विश्वास नहीं हुआ। गजानन ने मेरी जिंदगी नर्क बना दी थी। मगर अब मैं उसे नहीं छोडूंगी। अब मैं गजानन से बदला लूँगी।
दूसरे ही दिन मुझे पता चला कि गजानन अपने कमरे में मृत पाया गया। कमरे का दरवाजा भीतर से बन्द था। उसे तोड़कर जब लोग भीतर घुसे तो देखा वह विस्तर पर औंधे मुंह पड़ा था। मुंह से काफी खून विस्तर पर फैलकर बिखर गया था। गजानन की मृत्यु सबके लिए रहस्य बनी रही। परिस्थितियों को देखरेख कोई हत्या की कल्पना भी नहीं कर सकता था। अतः पुलिस ने आत्महत्या मानकर केस बंद कर दिया।
मैंने श्यामली की मृतात्मा से संपर्क करना चाहा था मगर हो गया शोभा से। अच्छा ही हुआ, एक रहस्य तो खुल गया। यह भी निष्कर्ष निकला कि मृतात्माएँ किसी न किसी तरह अपना बदला लेकर ही मानती हैं। मगर भौतिक दृष्टि से लोगों को कार्य-कारण सम्बन्ध अंततक समझ में नहीं आता।
आगे है–‘श्यामली की मृतात्मा से संपर्क’।
भाग–4
*******
श्यामली की आत्मा और दादाजी की आत्मा से संपर्क ********************************
शोभा की आत्मा से संपर्क करने के बाद मैंने कई बार श्यामली की मृतात्मा से संपर्क करना चाहा मगर बराबर असफल रहा। कारण समझ में नहीं आया। श्यामली से संपर्क होने के बजाय आस-पास की भटकती अतृप्त आत्माओं से मेरा संपर्क हो जाता था।
आखिर एक रात इसका रहस्य खुल गया। हमेशा की तरह तेल का दीपक जलाकर आधीरात को मन्त्र जप कर रहा था। सहसा मुझे एक बिजली-सा झटका लगा। उसीके साथ मैंने देखा–सामने एक युवती खड़ी थी। मैं तुरन्त पहचान गया। वह श्यामली थी। वह मेरे करीब आना चाहती थी, पर जब भी इसके लिए प्रयास करती तो मेरे और उसके बीच कोहरा जैसा एक पतला पर्दा सा आ जाता।
श्यामली ने मुझे बतलाया–जब भी मैंने तुमसे संपर्क करने का प्रयास किया बार बार मुझे यहाँ आने के लिए कोई अदृश्य शक्ति रोक देती थी। उसके बाद उसने मुझे जो रहस्यमयी कथा सुनाई, वह निश्चय ही पारलौकिक दृष्टि से मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण थी।
गजानन ने ही उसकी हत्या की थी। काफी देर तक तो श्यामली को अपने मरने का अहसास नहीं हुआ था। जब उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हुई, उस समय तक हरिश्चन्द्र घाट पर उसकी लाश आधी से अधिक जल चुकी थी। वह मेरे पास भी पहुंची और मुझसे बात करने की भी काफी कोशिश की, मगर कर न सकी। उसको सबकुछ सपने जैसा लग रहा था। उसी स्थिति में वह न जाने कितने दिनों तक पृथ्वी के वातावरण में भटकती रही थी। कोई अदृश्य शक्ति बराबर उसे इधर-उधर ढकेलती रहती। तभी उसकी दृष्टि एक औरत पर पड़ी। उसने अनुभव किया कि उसकी वासना, भावना और संस्कार उस औरत से काफी मिलते जुलते हैं। एकाएक उस अदृश्य शक्ति के वशीभूत होकर वह उस औरत के शरीर में प्रवेश कर गयी और उसीके साथ उसकी अंतर्चेतना भी लुप्त हो गयी। जब वह वापस लौटी तो उसने अपने आपको शरीर के बन्धन में पाया। वह औरत श्यामली की माँ थी और श्यामली उसकी लड़की।
अन्त में श्यामली ने बतलाया– इस समय मैं पलंग पर अपनी माँ के पास सोई हुई हूँ। मेरे शरीर में केवल सूक्ष्मतम प्राण स्पन्दन कर रहा है। बाहरी तौर से मैं एक प्रकार से मर चुकी हूँ। अगर तुमने मुझे शीघ्र मुक्त नहीं किया तो हो सकता है कि मेरी आत्मा से मेरे शरीर का संपर्क टूट जाए।
मैंने तुरंत ही श्यामली की आत्मा को बन्धन मुक्त कर दिया।
श्यामली के संपर्क से अपनी खोज की दिशा में मुझे दो नयी बातें मालूम हुईं। पहली यह कि मृतात्मा की अंतर्चेतना यदि किसी कारण से लुप्त है तो उससे किसी भी प्रकार से संपर्क नहीं हो सकता। दूसरी बात यह कि यदि मृतात्मा ने कहीं जन्म ले लिया है तो कुछ समय तक अंतर्चेतना के कारण पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहती है। यदि समय की अवधि बढ़ गयी तो उसी स्मृति के आधार पर बालक या बालिका अपने पूर्व जन्म की बातें बतला देती है। जीवन में अंतर्चेतना का बहुत महत्व है। कोई भी शक्ति जो मृतात्मा से संपर्क स्थापित करने का आधार है, तभी सक्रिय होती है जब अंतर्चेतना जाग्रत रहती है।
इसी संदर्भ में मैं एक दूसरी विचित्र रोमांचक घटना सुनाये दे रहा हूँ। मैंने दूसरी विधि के अनुसार अपने एक मित्र के लडके राघव को माध्यम बनाया और उस पर अपने दादाजी की आत्मा का आवाहन करने का प्रयास किया। उनकी मृत्यु एक साल के अन्दर ही हुई थी। वे साधक पुरुष थे। उनका जीवन सात्विक और त्यागमय था। चार घंटे के अथक प्रयत्न के बाद उनकी आत्मा आई। मैंने वास्तविकता को समझने के लिए तुरंत प्रश्न किया–आपकी मृत्यु कब किस दिन हुई थी ?
आत्मा ने सही सही उत्तर दिया।
आपका अस्तित्व इस समय कहाँ है ?–मैंने पुनः प्रश्न किया।
पृथ्वी से बहुत दूर अंतरिक्ष में । इसीलिए आने में इतना समय लगा है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी हमारे लिए बाधक है। इससे भी अधिक कठिन है मनुष्य से संपर्क स्थापित करना।–दादाजी की आत्मा ने मुझे बतलाया।
मृत्यु के तुरंत बाद क्या आप मानव अस्तित्व से सम्बन्ध भंग कर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल गए थे ?
नहीं, कुछ समय तक मृत्यु के बाद प्राप्त नए जीवन और नए वातावरण को समझने का मैंने प्रयास किया और अपनी चिता के जलने तक यहाँ रहा, फिर गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल गया।
क्या आपको अपने परिवार के सदस्यों का स्मरण होता है ?
क्यों नहीं, मगर उन्हीं सदस्यों के विषय में अधिक सोचता हूँ जिनका मुझसे जीवनकाल में सबसे अधिक आत्मीय सम्बन्ध था।
क्या आप मुझे कोई सन्देश देना चाहते हैं ?
हाँ, भविष्य से सम्बंधित कुछ बातें बतला देता हूँ। तुम्हारी कल्याणकारी प्रवृत्ति उपकार, दया, करुणा की भावना ही तुम्हारे नाश का कारण बनेगी। परिवार में तुम्हारा अपना कोई न होगा। सभी तुम्हारे प्रति स्वार्थी होंगे। तुम्हारी मानसिक और वैचारिक उच्चता को साधरण लोग नहीं समझ सकेंगे। नारी के प्रति सदा तुम्हारे हृदय में स्नेह, प्रेम और अपनत्व की भावना रहेगी। मगर बार बार तुम्हें उससे धोखा मिलेगा। सन् 1970 से 1980 के बीच का समय तुम्हारे लिए मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक संक्रांति का काल होगा। 1970 के प्रारम्भ में तुम्हारे जीवन में आने वाली एक स्त्री इस संक्रांति काल का मुख्य कारण बनेगी। तुम उस स्त्री के जघन्य अपराधों और भयंकर पापों को धोने का काफी प्रयास करोगे और उसके कलुषित जीवन में अध्यात्म का संचार करने का भी प्रयास करोगे मगर इसका परिणाम उल्टा ही होगा। समझ लो एक चोर को साधू नहीं बनाया जा सकता। पर एक साधू को बड़ी सरलता से चोर अवश्य बनाया जा सकता है।
इतना कहकर दादाजी की आत्मा अन्तर्ध्यान हो गयी।
आगे है–‘डाकू मानसिंह की आत्मा से संपर्क’।
भाग–5
**********
डाकू मानसिंह की आत्मा से संपर्क
दादाजी की आत्मा तो अन्तर्ध्यान हो गयी मगर दूसरे ही क्षण राघव(माध्यम) का पूरा शरीर बुरी तरह कांपने लगा। जैसे मिर्गी का दौरा पड़ गया हो उसे। चेहरा काला पड़ गया और ऑंखें लाल हो उठीं। मैं सोच ही रहा था –दादाजी की आत्मा के जाते ही राघव को क्या हो गया। मैंने तान्त्रिक क्रिया बन्द कर दी। उसका भी कोई कुपरिणाम नहीं हो सकता था। मैं एकटक राघव की ओर देख रहा था।
अचानक ख्याल आया कि सम्भव है–राघव की आत्मा दादाजी की आत्मा की शक्ति से विचलित हो गयी हो और उसीका यह परिणाम हो।
मगर नहीं, मेरा विचार सही नहीं था। एकाएक राघव चीख पड़ा और उसीके साथ अट्टहास करते हुए बोला–जानते नहीं, मैं कौन हूँ ?
राघव के चीखने व अट्टहास करने के ढंग से मैं समझ गया कि उस पर कोई तमोगुणी दुष्ट आत्मा आ गयी है।
मैं डाकू मानसिंह हूँ।
यह सुनकर मैं घबरा गया। हाथ से माला छूटकर गिर गयी। किसी प्रकार अपने को संभाला और फिर शान्त स्वर में पूछा–मैंने तो आपको बुलाया नहीं, फिर आप कैसे आ गए ?
मैं रामनगर की रामलीला देखने प्रतिदिन जाता हूँ, इधर से ही गुजरता हूँ। मुझे यहाँ का वातावरण अच्छा लगा। थोड़ी शान्ति का अनुभव हुआ। इस लडके की आत्मा सोई हुई मिली, इसकी अंतर्चेतना भी लुप्त मिली तो मैंने सोचा और फिर आ गया।
आपकी क्या इच्छा है, क्या चाहिए आपको ?
काफी दिनों से भूखा हूँ, खाना खिला सकते हो ?
क्या खाएंगे आप ?
मुर्गे का गोश्त और शराब…
अभी मानसिंह का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि उसीके साथ झनझना कर सौ रूपये के सिक्के ज़मीन पर मेरे चारों तरफ गिरकर बिखर गए। कहाँ से और किधर से आये रूपये ?–मैं तत्काल समझ न सका। तभी कड़कड़ाती हुई आवाज़ गूंजी–ये रुपये मेरे हैं। आपको मुर्गा और शराब लाने के लिए दिए हैं।
हे भगवान ! कहाँ फंस गया मैं ? तत्काल मैंने अपने एक साथी को रात ग्यारह बजे मुर्गे का गोश्त और शराब की बोतल लाने के लिए भेज दिया। मैं जान गया था कि बिना खाये-पिये मानसिंह की आत्मा पिण्ड नहीं छोड़ने वाली।
मैंने सामने गोश्त की प्लेट और शराब की बोतल राख दी। राघव के माध्यम से डाकू मानसिंह की आत्मा ने दस मिनट के अन्दर प्लेट का सारा गोश्त और शराब की बोतल खाली कर दी।
मैं भौंचक्का सा देख रहा था। फिर मैंने पूछा–अब तो आप जायेंगे न ?
हाँ, अब मैं जाऊंगा, मगर सुनो, तुमने मेरी सहायता की है, इसके बदले तुम मुझसे क्या चाहते हो ?
मैंने मन में सोचा–एक भयंकर डाकू की दुष्ट आत्मा से मुझे भला क्या काम ? फिर मैंने विनम्र स्वर में कहा–बस, आपकी मेहरबानी चाहिए।
मेरी बात सुनकर डाकू मानसिंह की आत्मा एकबारगी खिलखिला कर हंस पड़ी। फिर सहज स्वर में बोली–तुम मुझसे भले ही डर रहो हो, डर से कुछ न मांग रहे हो। मगर मैं तुम्हारी एन मौकों पर बराबर मदद किया करूँगा–यह डाकू मानसिंह का वादा है।
मानसिंह की आत्मा के अन्तिम शब्दों के साथ ही राघव सहज हो उठा। डाकू मानसिंह की आत्मा जा चुकी थी। वह आँखें फाड़कर अँधेरे कमरे में चारों ओर देखने लगा।
राघव ! अब तुमको कैसा लग रहा है ?–मैंने पूछा।
बस, ऐसा लग रहा है कि गहरी नींद से मैं अचानक जाग पड़ा।
आत्माओं से संपर्क करने की सच्ची कहानी तो यहाँ ख़त्म हो गयी। मगर अन्त में दो बातें बतला देना जरुरी समझता हूँ। पहली बात यह कि दादाजी की आत्मा ने जो भविष्यवाणियाँ की थीं, वे सत्य सिद्ध हुईं। दूसरी बात यह कि डाकू मानसिंह की आत्मा ने अदृश्य रूप से कई विषम परिस्थिति में मेरी आर्थिक सहायता की। आज भी उसकी आत्मा रामनगर की रामलीला देखने आती है और यह कि वह डाकू की आत्मा थी तो क्या हुआ। डाकू अपने वायदे के पक्के होते हैं। उसने बार बार अपना वादा समय पर निभाया। बिकट स्थिति में भी वह मेरी आर्थिक सहायता करती रही।
समाप्त |||

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *